बड़े गुलाम अली के दादरा की बंदिश से उस्ताद ने बनारस घराने के संगीत प्रेमियों के जेहनोदिल पर छोड़ी छाप
गजलों के शहंशाह उस्ताद गुलाम अली की सुरों की कशिश से मंगलवार की रात कभी लय के भावों में बहकी तो कभी रागों-बंदिशों की गमक से निखर उठी। सरहद पार कर आए उस्ताद इस बार सुर में तो थे लेकिन अंदाज जुदा नजर आया। गजलों की दुनिया दिल में दबाए उस्ताद ने दादरा, ठुमरी की लोच से मुहब्बत का सिलसिला छेड़ा और फिर प्यार इंसानियत की गजलों को सुरों से साझा करने लगे। जग विख्यात संकट मोचन संगीत समारोह की पहली निशा का आगाज मंगलवार की रात इसी अंदाज में हुआ।
टूटकर बिखरे दिलों की बातें, प्यार के अफसानें उस्ताद के सुरों में सुनने के लिए शाम ढलते ही संगीत प्रेमियों का कारवां संकट मोचन हनुमान के दरबार में उमड़ पड़ा। लोग मंदिर की छतों, परिसर के बारजों से लेकर परिक्रमा पथ के हर कोने तक जगह लेकर बैठ गए। दिल्ली से आए पं. विश्वनाथ के गायन के बाद रात पौने नौ बजे उस्ताद गुलाम अली ने जैसे ही मंच संभाला हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगे। उस्ताद गुलाम अली ने हारमोनियम पर हाथ रखने के बाद अपने चिर परिचित अंदाज में मौजूं शेर पढ़ा-रोज कहता हूं भूल जाऊंगा उसे/पर हर रोज ये बात भूल जाता हूं...।
तालियों से संगीत के गुणीजनों ने उनका स्वागत किया। इनके बाद हनुमत के दरबार में अपने गुरु बड़े गुलाम अली के दादरा की बंदिश से उन्होंने शुरुआत की। राग विहाग में बंदिश के बोल थे-मैंने लाखों के बोल सहे सितमगर तेरे लिए...। सुर-लय की गलबहियां शुरू हो गईं। उस्ताद ने दादरा के बाद फिर शेर उछाल दिया- अंदाज देखते हैं अपना आइने में वो/और ए भी देखते हैं कोई देखता न हो...।
फिर नारिस काजमी की गजल से सिलसिले को उन्होंने आगे बढ़ाया। तेरा मिलना खुशी की बात सही/तुझसे मिलकर उदास रहता हूं...। उन्होंने गजल पेश की- दिल में एक लहर सी उठी है अभी/कोई ताजा हवा चली है अभी...। इसी तरह उन्होंने दो और गजलें संकट मोचन के दरबार में पेश कीं। तबले पर अनिंदो चटर्जी, अतहर हुसैन, इशराज पर अरशद खां, सितार पर ध्रुवनाथ मिश्र ने संगत की। इनसे पहले डॉ. विश्वनाथ ने राग बागेश्री में बंदिश से आगाज किया। उन्होंने एक भजन के बाद रघुपति राघव राजाराम की प्रस्तुति की। इनके बाद पं. टीएन शेषगोपालन ने मंच संभाला। उन्होंने राग हंसध्वनि की अवतारणा की। वायलिन पर जी राघवेंद्रम, मृदंगम पर एलेनतूर जयन पी दास ने संगत की।