रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए मार्च महीने में खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया। जिले के 4.65 लाख परिवारों को दो रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं और तीन रुपये प्रति किलो की दर से चावल देने के लिए कोटेदारों के यहां अनाज पहुंचाया गया। लेकिन, पुराने और नए कार्ड के भ्रमजाल में फंसी जनता को अनाज के लिए मारामारी करना पड़ रहा है। जनता की परेशानी अनाज न मिलने की है तो कोटेदारों का अपना रोना है। खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारी केवल योजना को लागू करने का कोरम पूरा करने में लगे हैं उन्हें जनता की परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है। ...ताकि कोई भूखा न रहे और निम्न आय वर्ग के लोगों की जेब पर बाजार की महंगाई डाका न डाल पाए इसलिए खाद्यान्न वितरण प्रक्रिया और योजना में चल रही समस्याओं को उजागर करती यह रिपोर्ट प्रस्तुत है।
जिले में इसी मार्च से खाद्य सुरक्षा कानून लागू हो गया। मगर उसका लाभ लोगों तक पहुंचाने के लिए विभाग और सरकारी तंत्र अभी तक नहीं तैयार हो पाया। सस्ता अनाज मिलने की बात दूर अभी तक ठीक तरह से सूची ही तैयार नहीं हो पाई है। नाम, पते, सदस्य संख्या में गड़बड़ियों की असंख्य शिकायतें मिल रही हैं।
अधिकांश की शिकायतें हैं कि पात्र होने के बाद भी उनका नाम उड़ा दिया गया। अब जब वह इसकी शिकायतें दर्ज करा रहे हैं तो विभाग इन्हें नहीं दुरुस्त करा पा रहा है। शिकायतें तहसील दिवसों से होते हुए अब धरना-प्रदर्शन तक पहुंच गई हैं। जहां अनाज मिल भी रहा है वहां भी लोगों की तमाम शिकायतें आ रही हैं। ...लेकिन जनता की परेशानियों पर भी कान नहीं दे रहे और पूरी योजना को साफ-सुथरे तरीके लागू कराने के लिए भी प्रतिबद्ध नहीं दिख रहे हैं। उधर, कोटेदारों के यहां जाने वाले जनता को अनाज के लिए दुत्कार भी सहना पड़ता है। कार्डधारकों को खाद्य सुरक्षा योजना के बारे में अधिक जानकारी न होने का फायदा भी कोटेदार उठा रहे हैं। कोई कार्ड में नाम-पते की त्रुटि के चलते अपना राशन नहीं ले पाया है तो वहीं तमाम लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अब तक गृहस्थी कार्ड जारी ही नहीं हो पाया है। राशन न मिल पाने से फिलहाल ऐसे परिवारों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ेगी कैसे।