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वाराणसी: चक्र पुष्करणी कुंड पर आस्था की डुबकी, यहीं प्रकट हुई थीं मां मणिकर्णिका, स्नान से पुण्य मिलने की मान्यता

Sun, 16 May 2021 12:46 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

वाराणसी में गंगा से भी प्राचीन मणिकर्णिका चक्र पुष्करणी कुंड में अक्षय तृतीया के दूसरे दिन स्नान की पंरपरा है। ऐसी मान्यता है कि कुंड में स्नान से अक्षय फल, चारों धाम के पुण्य का लाभ मिलता है। यहां कोरोना संक्रमण के कारण लगातार दो साल से श्रद्धालुओं के लिए स्नान स्थगित है।
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अक्षय तृतीया के दूसरे दिन निभाई स्नान की परंपरा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वाराणसी मणिकर्णिका घाट स्थित चक्र पुष्करिणी कुंड पर शनिवार को स्नान की परंपरा का निर्वहन किया गया। महामारी के कारण आम श्रद्धालु तो नहीं रहे लेकिन पुजारी परिवार ने ही पापों से मुक्ति व पुण्य फल की कामना से कुंड में डुबकी लगाई। शनिवार को मां मणिकर्णिका के शृंगार के बाद पुजारी परिवार ने माता का विशेष स्नान-अनुष्ठान के बाद विधि-विधान से शृंगार किया।

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महामारी के कारण माता की शोभायात्रा नहीं निकली और प्रतिमा कुंड तक नहीं गई। हर साल अक्षय तृतीया पर मां मणिकर्णिका का विग्रह चुक्रपुष्करणी कुंड के मध्य विराजमान कराई जाती थी लेकिन पिछले साल से कोरोना महामारी ने परंपरा पर ग्रहण लगा दिया है।

प्रधान पुजारी जयेंद्र नाथ दुबे बब्बू महाराज ने बताया कि महामारी के कारण सार्वजनिक स्नान स्थगित कर दिया गया था। केवल पुजारी परिवार के लोगों ने स्नान की परंपरा का निर्वहन किया। यहां कोरोना संक्रमण के कारण लगातार दो साल से श्रद्धालुओं के लिए स्नान स्थगित है।

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कुंड से प्रकट हुई थीं मां मणिकर्णिका

पुजारी ने बताया कि मान्यता है कि मणिकर्णिका मां की अष्टधातु की प्रतिमा प्राचीन समय में इसी कुंड से निकली थी। ढाई फीट ऊंची यह प्रतिमा वर्षभर ब्रह्मनाल स्थित मंदिर में विराजमान रहती है। सिर्फ  अक्षय तृतीया को सवारी निकालकर पूजन-दर्शन के लिए प्रतिमा कुंड स्थित 10 फीट ऊंचे पीतल के आसन पर विराजमान कराई जाती है। माना जाता है कि मणिकर्णिका माई के स्नान से तीर्थ कुंड का जल अगले एक वर्ष के लिए सिद्ध हो जाता है और इसी जल में स्नान करने से श्रद्धालुओं के पाप दूर होते हैं।

गंगा से भी प्राचीन है कुंड

मणिकर्णिका घाट पर स्थित मणिकर्णिका चक्र पुष्करणी कुंड में स्नान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। काशी खंड के अनुसार गंगा अवतरण से पहले इसका अस्तित्व है। भगवान विष्णु ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए यहां हजारों वर्ष तपस्या की थी। भोलेनाथ और देवी पार्वती के स्नान के लिए उन्होंने कुंड को अपने सुदर्शन चक्र से स्थापित किया था। स्नान के दौरान मां पार्वती का कर्ण कुंडल कुंड में गिरने से नाम मणिकर्णिका पड़ा। यहां पर अक्षय तृतीय पर स्नान का अधिक महत्व है।
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चारों धाम का पुण्य मिलने की मान्यता

मान्यता है कि कुंड में स्नान से अक्षय फ ल, चारों धाम के पुण्य का लाभ मिलता है। अक्षय तृतीया के दिन मणिकर्णिका घाट स्थित चक्र पुष्करणीय कुंड में स्नान.दान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। कोरोना संक्रमण के कारण लगातार दो साल से श्रद्धालुओं के लिए स्नान स्थगित है।

वाराणसी में गंगा से भी प्राचीन मणिकर्णिका चक्र पुष्करणी कुंड में अक्षय तृतीया के दूसरे दिन स्नान की पंरपरा है। ऐसी मान्यता है कि कुंड में स्नान से अक्षय फल, चारों धाम के पुण्य का लाभ मिलता है। 
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