इस होली की सनातन धर्म में कई धार्मिक मान्यताएं हैं, जिसके अनुसार भगवान भोलेनाथ ने यमराज को हराने के बाद चिता की राख से होली खेली थी। तभी से इस दिन को यादगार बनाने के लिए प्रत्येक वर्ष भस्म की होली खेली जाती है। साथ ही शिव अघोरियों और भूत-प्रेतों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। इस होली को मृत्यु पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है। हालांकि इसका कोई भी प्रमाण शास्त्रों या पुराणों में नहीं मिलता है।
जाने कब है भस्म की होली
हरिश्चन्द्र घाट पर 20 मार्च को व मर्णिकर्णिका घाट पर 21 मार्च को भस्म की होली खेली जाएगी। इस दौरान महाश्मशान पर भस्म की होली खेलने के लिए जनसैलाब उमड़ता है।
हरिश्चन्द्र घाट अघोरी बोले
हरिश्चन्द्र घाट पर बैठे अघोरी ने कहा की होली खेलने की यह परंपरा कई साल पुरानी है। इसमें हम अघोरी महादेव को नमन करते हुए, चिताओं की भस्म को उड़ाते हुए होली खेलते हैं। अघोरियों की बरात कीनाराम स्थल से हरिश्चन्द्र घाट पर आती है। जिसमें देशभर के अघोरी शामिल होते हैं। उनमें से कुछ अघोरी काशी में ही रूक जाते हैं।