बनारस में रामनगर की ऐतिहासिक श्रीरामलीला अनंत चतुर्दशी के दिन यानी रविवार की शाम पांच बजे से शुरू हो जाएगी। रावण जन्म और क्षीरसागर की झांकी के साथ लीला का शुभारंभ रामबाग पर होगा। इसके लिए सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। आयोजक रामनगर किला और नगर पालिका प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
सफाई इंचार्ज संजय पाल की अगुआई में नगरपालिका के 50 कर्मचारियों ने रामबाग पोखरा और रावण जन्म वाले स्थान पर युद्ध स्तर पर सफाई अभियान चलाया। इसके अलावा शिल्पकारों ने क्षीरसागर की झांकी में प्रयोग होने वाले शेषनाग के पुतले को अंतिम रूप दिया। दुर्ग प्रशासन की ओर से सभी पात्रों को उनके वस्त्र और आभूषण सौंप दिए गए।
बता दें कि पांच मुख्य स्वरूप का शृंगार तो रामलीला व्यास अपने हाथों से करते हैं लेकिन अन्य पात्र घर से ही तैयार हो कर लीला स्थल पहुंचते है। इस रामलीला की खास बात ये है कि सिर्फ राजा की भूमिका निभाने वाला पात्र ही जूते पहन कर लीला स्थल में प्रवेश करता है।
फिलहाल रामनगर में राममय माहौल तैयार है लेकिन साधुओं की जमात देखने को अभी तक नहीं मिली। साल दर साल इनकी संख्या कम होती जा रही है। पहले यह स्थिति रहती थी कि कोई भी मंदिर या धर्मशाला खाली नहीं रहता था।
इससे पहले शनिवार को रामलीला के निर्विध्न समाप्ति की कामना के साथ रामनगर किले में देवताओं के राजा इंद्र की विधिवत पूजा की गई। पूजा के बाद किले के दक्षिणी बुर्ज पर सफेद ध्वज फहराया गया। वहीं शाम के समय बाघम्बरी बग्घी का भी ट्रायल किया गया। इसी बग्घी से कुंवर अनंत नारायण सिंह की शाही सवारी दूर के लीला स्थलों तक पहुंचेगी।
तब नावों से ही रामलीला देखने आते थे बनारसी
रामलीला में उमड़ते हैं लोग
पहले आवागमन की सुगमता न होने से बनारस के लोग बड़ी संख्या में नावों से रामनगर की रामलीला देखने पहुंचते थे। बनारस के हर घाट से एक -दो नावें निकलती थीं। गंगा में नावों का रेला लग जाता था। लीला में जल्दी पहुंचने की स्पर्धा भी हो जाया करती थी।
यूं तो बहुतेरे लीला प्रेमी दूर दराज से आते है लेकिन मध्य बनारस के लीला प्रेमियों की संख्या ज्यादा मायने रखती है। विशेष रूप से पक्के महाल तथा उसके आसपास के नेमी अधिक होते हैं, जो रामनगर की श्रीराम लीला को बनारसी रंगत से लबरेज कर देते हैं।
रामलीला के प्रारम्भिक दौर में जब राजघाट पुल नहीं बना था तब लीला प्रेमियों के लिए जलमार्ग ही एक सहारा था। पीपा पुल की कभी मदद नहीं मिली क्योंकि रामलीला के समय गंगा बढ़ी रहती हैं। लोग नावों से ही लीला देखने आते थे।
सन 1867 में राजघाट पुल बन जाने से लीला प्रेमियों के लिए पहला सुगम रास्ता बना। जिस पर पैदल, इक्का, तांगा, घोड़े, साइकिल से लोग रामलीला में पहुंचने लगे। कालांतर में विश्व सुंदरी पुल और अब सामने घाट पुल बन जाने से रामनगर की जल मार्गीय परंपरा लुप्त हो रही है। फिर भी बनारस के बहुत से नेमी अब भी नावों से ही रामनगर की रामलीला देखने पहुंचते हैं, जो जलमार्ग परम्परा को कायम रखे हुए हैं।