इस आखिरी प्रस्तुति में वेदी ने फ्यूजन के शिल्प में निर्गुण गीतों की प्रस्तुति से समा बांध दिया। कबीर के पद निर्भय निर्गुण रे गाऊंगा... से शुरुआत करके वेदी 20 मिनट निराकार के कई प्रकारों तक गईं। द आह्वान प्रोजेक्ट के कलाकारों की ओर से निर्गुण गीतों की प्रस्तुति का अंदाज दर्शकों को खास लगा।
ड्रम-गिटार के साथ आए सुमंत बालाकृष्णन, मकरंद सनॉन और वरुण गुप्त ने मंच पर कबीर धुन बजाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद वेदी ने प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित एक मधुर कहानी भी सुनाई।
भूली सखी रे कहां जाऊं, कबीर के पद हद अनहद दोऊ तपै, ताको नाम फकीर और मन का चक्का दिया चलाय ने दर्शकों को घंटों काशी के फक्कड़पन में बांधे रखा। लखनऊ की नफासत और बनारस की फक्कड़ संस्कृति के संगम से सजी इस दास्तानगोई को श्रोताओं ने खूब सराहा।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप मिश्र ने बनारसियत, पान और शहर की हाजिरजवाबी से जुड़े संस्मरणों को सुनाकर लोगों को खूब हसाया। कार्यक्रम में अतुल तिवारी ने चौथे स्वर के रूप में संवाद को नई दिशा दी। इस खुले मंच के कार्यक्रम में जौनपुर, बहराइच, सुल्तानपुर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र, प्रयागराज और रीवा सहित कई शहरों से बड़ी संख्या में पहुंचे युवा श्रोताओं ने बिना झिझक के अपने तीखे और गुदगुदाते सवाल किए।
गोरों से सुना है वो भी काशी को घर बताते हैं : कमलेश
शुक्रवार को कार्यक्रम की शुरुआत नागरीप्रचारिणी सभा के मुक्ताकाशी मंच पर वरिष्ठ पत्रकारों और युवाओं के साथ बनारसियत थीम पर संवाद से हुई। वरिष्ठ पत्रकार कमलेश किशोर ने कहा कि कुछ शहर ऐसे होते हैं जहां आप पहली बार नहीं आते। बनारस आकर लगता है कि यहां आ चुका हूं। गोरों से सुना है कि वो भी इसे अपने घर जैसा महसूस करते हैं। बनारस को जानने के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है। बनारस कभी बदला नहीं।
हिमांशु ने लखनवी अंदाज में जीवंत की काशी की विरासत
दास्तानगोई के दास्तानगो हिमांशु वाजपेयी और डॉ. प्रज्ञा ने बनारस और लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत को अपने विशिष्ट लखनवी अंदाज में जीवंत किया। कबीर के पदों और साखियों को किस्सों में इस तरह पिरोया गया कि श्रोता पूरे समय मंत्रमुग्ध रहे। दर्शकों को उनकी कहानी पूरी प्रस्तुति जैसी लगने लगी। दास्तानगोई में संत कबीर और उनके गुरु स्वामी रामानंद की पंचगंगा घाट पर हुई ऐतिहासिक भेंट की चर्चा हुई।
बनारस की लोक-संस्कृति और कबीर के जीवन-दर्शन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। साथ ही जयशंकर प्रसाद, बनारसीदास चतुर्वेदी, कराची हिंदी साहित्य सम्मेलन और अमृतलाल नागर से जुड़े रोचक संस्मरणों ने प्रस्तुति को और समृद्ध बनाया।
76 साल पहले नागरी प्रचारिणी में था भारत कला भवन
76 साल के बाद बीएचयू के भारत कला भवन संग्रहालय और नागरी प्रचारिणी सभा का मेल हुआ। प्रचारिणी सभा के 134वें स्थापना दिवस समारोह के तहत शुक्रवार को सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय में बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित चतुर्वेदी ने प्रतिपदा कला दीर्घा और पावस शीर्षक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।
ये सभी चित्र भारत कला भवन से आए थे। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि 1950 के पहले तक भारत कला भवन सभा का अंश था। महात्मा गांधी ने यहीं पर कला भवन की सामग्री का अवलोकन किया था। स्थान कम होने के चलते कला भवन बीएचयू का हिस्सा बन गया और यह पुराना संबंध ध्यान से उतर गया। 76 साल बाद भारत कला भवन प्रदर्शनी में शामिल चित्रों के रूप में फिर से सभा लौटा है।
कुलपति प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि दोनों संस्थाओं को साथ मिलकर बड़ी परियोजनाओं को अपने हाथ में लेना चाहिए। दोनों संग्रहालयों में उपलब्ध वस्तुओं और हस्तलेखों की प्रतिकृतियां दोनों संस्थाओं के पास होनी चाहिए। निदेशक श्रीरूप राय चौधरी ने घोषणा की कि इस प्रदर्शनी में शामिल सभी चित्र सभा को भेंट किए जा रहे हैं। उप निदेशक डॉ. निशांत ने उपलब्ध दुर्लभ साहित्यिक संपदा पर चर्चा की।