भारत में दो अलग-अलग नस्लें कभी नहीं रहीं : प्रो. चौबे ने यूरोसेनट्रिक दावों को खारिज कर कहा कि भारत के लोगों को खांचे में बांटना हार्वर्ड की एक सोची-समझी साजिश है। हजारों डीएनए सैंपल के अध्ययन से यह समझ आया है कि आनुवंशिक रूप से ऐसी कोई भी दो अलग-अलग नस्लें भारत में कभी नहीं रहीं।
इस दौरान उन्होंने मेसोपोटामिया और सिंधु घाटी सभ्यता के डीएनए रिसर्च और पुरातत्वविद् प्रो. वसंत शिंदे के कार्यों का उल्लेख कर कहा कि बाहर से आकर किसी नस्ल के हावी होने की बात पूरी तरह निराधार है। कार्यक्रम में प्राचार्य प्रो. रीता सिंह, डॉ. विवेकानंद उपाध्याय, डॉ. मनीष मीना, डॉ. ऊषा रानी रहे।
हार्वर्ड की थ्योरी नस्लीय षड्यंत्र का नया रूप
एमएमवी के डॉ. स्वतंत्र सिंह की ओर से आयोजित प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व के विशेष व्याख्यान में प्रो. चौबे ने आरोप लगाया कि तत्कालीन समय में हार्वर्ड की ‘एएनआई-एएसआई’ थ्योरी अंग्रेजों के नस्लीय षड्यंत्र का नया रूप है। सदियों से भारतीयों को उत्तर और दक्षिण या ‘आर्य और द्रविड़’ के नाम पर बांटने वाली पश्चिमी थ्योरी पूरी तरह से भ्रामक है।
कहा कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय की ओर से प्रचारित एएनआई (एसेस्ट्रल नॉर्थ इंडियन) और एएसआई (ऐन्सेस्ट्रल साउथ इंडियन) थ्योरी कभी भी भारत में अस्तित्व में थी ही नहीं, यह एक कंप्यूटर कन्स्ट्रक्ट है, जो सिर्फ अंग्रेजों की पुरानी रेसियल थ्योरी (नस्लीय सिद्धांत) को एक नई चाशनी में लपेटकर परोसने की कोशिश है।