कारोबारियों के मुताबिक, पहले हाथ से बने कालीनों पर अमेरिका में किसी प्रकार का टैरिफ नहीं लगाया जाता था, लेकिन अन्य भारतीय उत्पादों पर अलग-अलग श्रेणियों में 10 प्रतिशत तक शुल्क लगने से भारतीय सामान वहां महंगा हो गया। इसका असर यह हुआ कि अमेरिकी बाजार में मांग कमजोर पड़ी और पूर्वांचल के निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ा।
प्रसिद्ध कालीन निर्यातक और लघु उद्योग भारती के प्रदेश उपाध्यक्ष दीनानाथ बरनवाल का कहना है कि टैरिफ बढ़ने से सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका को भी नुकसान हो रहा है। भारतीय उत्पादों के महंगे होने से वहां के उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि अमेरिका लंबे समय से भारत के कृषि, पशुपालन और डेयरी सेक्टर में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करता रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार भी अमेरिका ही है।
प्रति वर्ष 6-7 हजार करोड़ का होता है कारोबार
पूर्वांचल निर्यातक संघ के अध्यक्ष रघु मेहरा के मुताबिक, पूर्वांचल से हर साल करीब 6 से 7 हजार करोड़ रुपये के उत्पाद अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं। इसमें कालीन, वॉल हैंगिंग, दरी, बनारसी साड़ी, सिल्क उत्पाद और हस्तनिर्मित खिलौने शामिल हैं। भदोही, मिर्जापुर, वाराणसी और आसपास के इलाकों में तैयार होने वाले कालीन दुनिया भर में अपनी गुणवत्ता और कारीगरी के लिए पहचाने जाते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी बाजार में इनकी मांग लंबे समय तक बनी रही है।