महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के छात्रसंघ चुनाव से इस बार आधी आबादी ने दूरी बना रखी है। संसद से लेकर पंचायत और सरकारी नौकरी में 33 फीसदी आरक्षण की वकालत भले देश भर में हो रही है लेकिन राजनीति की पहली पाठशाला में उनके आरक्षण, उनके हक की बात नहीं हो रही है।
इसमें केवल छात्र संगठनों या फिर राजनीतिक पार्टियों की ही कमी नहीं बल्कि खुद छात्राआें ने ही इसमें रुचि नहीं ली है। दो साल पहले आयुषी श्रीमाली ने अध्यक्ष बनकर इतिहास जरूर बनाया लेकिन इनके अलावा कोई छात्रा छात्रसंघ चुनाव में यहां कोई खास कहानी नहीं गढ़ सकी।
काशी विद्यापीठ में साल 2013 में होने वाले छात्रसंघ चुनाव में छात्राओं ने अपनी दावेदारी पेश की। हालांकि वो अपनी जीत नहीं दर्ज करा सकीं लेकिन 2016 में आयुषी श्रीमाली ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर एक नई इबारत जरूर लिखी।
बीते साल केवल एक ही छात्रा मैदान में उतरी लेकिन जीत हासिल नहीं कर सकीं। शायद यही वजह है कि छात्राओं ने इस बार चुनाव में अपनी हार पहले ही मान ली। कोई चुनाव में खड़ा होने का दम भी नहीं दिखा सकीं। वहीं छात्र संगठनों ने भी उन पर भरोसा नहीं जताया है।
मतदाताओं की संख्या : 8881
छात्रों की संख्या : 5243
तो क्या परिवार नहीं करता सपोर्ट
वहीं छात्राओं का कहना है कि चुनाव से पढ़ाई तो बाधित होती ही है, लेकिन इन सबसे बड़ी बात ये है कि हम चुनाव लड़ें, इसमें परिवार भी सपोर्ट नहीं करता। बीएससी की छात्रा स्वप्ना कुमारी कहती हैं कि उन्हें छात्रसंघ चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं है। जो छात्राएं खड़ी भी होती हैं वो खुद से कुछ नहीं कर सकतीं। करती वहीं हैं जो छात्र संगठन के नेता कहते हैं।
वहीं बीए की छात्रा सोनाली साफ कहती है कि विश्वविद्यालयों में छात्राओं के लिए चुनाव लड़ने का ऐसा माहौल नहीं है, इसलिए शायद छात्राएं चुनाव से दूरी बनाए रखी हैं।
समाजवादी छात्र सभा जिलाध्यक्ष अभिषेक मिश्रा ने कहा कि इस बार किसी भी छात्रा ने आवेदन ही नहीं किया था, ऐसे में हमने किसी छात्रा को चुनाव नहीं लड़ाया। हालांकि अगर छात्राओ ने रुचि दिखाई तो हम उन्हें वरीयता जरूर देते।
एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि इस बार छात्रसंघ चुनाव को लेकर ऊहापोह की स्थिति थी। ऐसे में कोई फिमेल कैंडीडेट अपनी तैयारी नहीं कर सकीं। एनएसयूआई ने बीते चुनाव में छात्राआें को चुनाव लड़ाया है।
चुनाव प्रचार को महज पांच दिन शेष
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में छात्रसंघ चुनाव के दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहे हैँ, प्रत्याशियों की धड़कन बढ़ गई है। विद्यार्थियों का वोट हासिल करने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। डोर टू डोर से लेकर सोशल मीडिया तक चुनाव प्रचार में प्रत्याशियों और उनके समर्थकों में झोंक दी है।
चुनाव प्रचार के लिए छात्राें को वैसे भी समय कम ही मिल पाया है। सोमवार को भी महाल्या का अवकाश होने की वजह से कैंपस में पठन पाठन स्थगित रहा। ऐसे में प्रत्याशी कैंपस में चुनाव प्रचार नहीं कर पाए। अब प्रत्याशियों के लिए महज पांच दिन का वक्त शेष रह गया है।
मंगलवार से कैंपस में चुनाव प्रचार में तेजी नजर आ रही है। अलग अलग टोलियों में प्रत्याशी और उनके समर्थक छात्र-छात्राओं से वोट अपील करते नजर आए। कैंपस में कक्षाओं से लेकर हास्टल तक उनके चुनाव प्रचार का रंग और गाढ़ा हो गया।