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घुमंतू फिल्म फेस्टिवल ने दिखाया समाज का स्याह चेहरा, घरेलू हिंसा-यौन व्यवहार पर खुली समाज की परतें

Sun, 19 Jan 2020 03:37 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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महात्मा गांधी काशी विधापीठ के गांधी अध्ययन पीठ में फिल्म फेस्टिवल देखते लोग। - फोटो : अमर उजाला।
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समाज में महिलाओं पर होने वाली हिंसा और यौन विषयों के संवेदनशील मुद्दों की परतें घुमंतू फिल्म फेस्टिवल में खुलीं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में दो दिवसीय घुमंतू फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ शनिवार को हुआ। मेन अगेंस्ट वायलेंस एंड एब्यूज (मावा) और समाज कार्य विभाग के तत्वावधान में आयोजित फिल्म फेस्टिवल की शुरूआत दिशांत सोनी की फिल्म वेब से हुई। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा पर समाज की असंवेदनशीलता को दर्शाती इस फिल्म ने दर्शकों का झकझोर कर रख दिया।

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ब्लैक एंड व्हाइट और कलर सिनेमा के मिश्रण में युवा महिला के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के प्रति समाज की असंवेदनशीलता का चित्रण सोचने पर विवश कर देता है। यौन संवेदनशीलता पर आधारित काय काय सेक्सुअल ने एलजीबीटीक्यूआईए समुदाय के मुद्दों को दर्शकों के सामने रखा।

इसमें गे, लेस्बियन, बायोसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर की यौनिकता को फिल्म में बखूबी दर्शाया गया। वहीं थीर्था मेनन की 10 मिनट की मलयाली लघु फिल्म रूचिभेदम में वैवाहिक संबंधों में अलग-अलग रूचि को रेखांकित किया गया है। एकतारा कलेक्टिव द्वारा निर्देशित हिंदी फीचर फिल्म तुरुप में लव जिहाद के मुद्दे को उठाया गया। तुरुप फिल्म की दर्शकों में सबसे अधिक चर्चा रही।

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शिखा मेनन निर्देशित बैचलर गर्ल मुंबई में लड़कियों के लिए घर की समस्या पर केंद्रित है। फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ कुलपति प्रो. टीएन सिंह ने किया।  स्वागत समन्वयक प्रो. संजय और गांधी अध्ययनपीठ के निदेशक प्रो. आर.पी. द्विवेदी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शैला परवीन और डॉ. संदीप गिरि ने किया। संचालन डॉ. निमिषा गुप्ता का रहा।

समलैंगिकता को कब मिलेगी मन से स्वीकार्यता
मावा के संस्थापक हरीश सदानी ने कहा कि समलैंगिकता को कानूनी मान्यता मिल चुकी है परंतु लोगों के मन से स्वीकार्यकता कब मिलेगी। यह बड़ा प्रश्न है। फिल्म मेकर मीनाक्षी सहारन ने सेक्सुअलिटी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज में बहुत असमानता हे। इस मुद्दे को बातचीत से ही समझा और समझाया जा सकता है। अल्तमश खान ने कहा कि अब फिल्में सवाल करने लगी हैं और रुढ़िवादिता को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं। छात्रों के प्रश्नों का रश्मि लांबा ने जवाब भी दिया। 
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