उस्ताद अहमद हुसैन और उस्ताद मोहम्मद हुसैन की गजलों के सुरूर और स्वरों की कशिश ने शुक्रवार की रात लोगों को दीवाना बना दिया। गजल गायकी की इस जानी मानी जोड़ी की झलक पाने के लिए लोग बेताब रहे। आकर्षण इतना था कि भीड़ उमड़ने की वजह से तमाम लोगों को खड़ा होने की जगह न मिलने की वजह से लौटना पड़ा। शाम-ए-गजल का यह आयोजन रथयात्रा स्थित कन्हैया लाल गुप्त स्मृति संस्थान में स्वरांगना ललित कला केंद्र और सनबीम शिक्षण समूह के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था।
फूलों से सजे भव्य मंच पर शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई। इसके बाद तो गजलों का शुरूर जब चढ़ने लगा तो लोग तालियों की बौछार के साथ महफिल को यादगार बनाने लगे। चल मेरे साथ ही चल/वो ऐ मेरी जाने गजल... से जब उन्होंने मिजाज बनाया तब तक महफिल में तिल रखने की जगह नहीं बची थी। लोग हॉल के बाहर धक्कामुक्की कर रहे थे। मैं हवा हूं नहीं वतन मेरा... मैं हवा हूं नहीं वतन मेरा...के बाद मौसम आएंगे जाएंगे हम तुमको भूल न पाएंगे... /बोल रहा था कल वो मुझसे... जैसी गजलों पर लोग झूमते रहे।
फरमाइश पर उन्होंने- तमाम शहर के रस्ते सजा दिए... और दर्द में डूबी है ए गजल...की प्रस्तुति की। इससे पहले दीपक मधोक ने हुसैन बंधुओं के साथ महफिल का उद्घाटन किया। अध्यक्षता स्वरांगना ललित कला केंद्र के अध्यक्ष प्रो. सीवी द्विवेदी ने की। इस मौके पर भारती मधोक, संगीत परिषद के अध्यक्ष विनय जैन, प्रफुल्ल चंद्र राय, तबला वादक अशोक पांडेय समेत तमाम लोग उपस्थित थे। संचालन प्रतिमा सिन्हा ने किया। धन्यवाद व्यक्त किया स्वरांगना के निदेशक सुरेंद्र मिश्र शीलू ने।