थामस ने एक बातचीत में कहा कि उनका मकसद गंगा की सफाई के साथ-साथ सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति को गहराई से समझना भी है। वे विभिन्न धर्मों का अध्ययन कर चुके हैं और अब हिंदू वेदों की ओर आकर्षित हुए हैं। काशी में उन्हें शांति और सुकून का अनुभव हो रहा है। उनके लिए वाराणसी न सिर्फ खूबसूरत है, बल्कि परंपराओं से भरा एक ऐसा शहर भी है, जहां हर कोने में भारतीय संस्कृति की झलक दिखती है। उन्होंने स्थानीय लोगों की सादगी और ईमानदारी की भी तारीफ की।
इस पहल के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। "बड़ी मां" ने बताया कि दशाश्वमेध घाट से आते वक्त उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर श्मशान देखा, जहां शव जलाए जा रहे थे। कुछ लोग शवों को पानी में भी छोड़ते हैं। इसी को देखकर थामस और उन्होंने मछलियां छोड़ने का फैसला किया, ताकि ये मछलियां उन अवशेषों को खाकर गंगा को शुद्ध रखें। यह कदम न सिर्फ पर्यावरण के लिए, बल्कि आध्यात्मिक नजरिए से भी एक अनूठी पहल बन गया।
काशी की इस यात्रा में थामस और उनके साथियों ने न केवल गंगा की सेवा की, बल्कि इस पवित्र शहर की महिमा को दुनिया के सामने पेश करने का प्रयास भी किया।