रील से रियल गेम तक का सफर...
पूर्व अंतरराष्ट्रीय भारोत्तोलक स्वाति सिंह कहती हैं, जेन-जी की दुनिया में गेमिंग अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ट्रेंड बन चुकी है। ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम्स में घंटों बिताने वाले युवाओं के लिए असली चुनौती अब मैदान में लौटने की है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्चुअल गेम रणनीति सिखाते हैं, लेकिन कबड्डी, खो-खो और पिट्ठू जैसे खेल शरीर और दिमाग दोनों को एक साथ सक्रिय रखते हैं। इन खेलों में टीमवर्क, नेतृत्व, त्वरित निर्णय और फिटनेस का ऐसा मेल मिलता है, जो स्क्रीन पर संभव नहीं। यही वजह है कि कई स्कूल अब डिजिटल और आउटडोर गतिविधियों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दे रहे हैं।
पारंपरिक खेल हमारी खेल संस्कृति की जड़ हैं। कबड्डी, खो-खो और गिल्ली-डंडा जैसे खेल बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता, नेतृत्व और टीम भावना विकसित करते हैं। यदि स्कूलों और पंचायतों के स्तर पर नियमित प्रतियोगिताएं कराई जाएं तो नई पीढ़ी का रुझान फिर इन खेलों की ओर बढ़ सकता है। -डॉ. एके सिंह, चेयरमैन, यूपी एडवेंचर स्पोर्ट्स क्लब
मोबाइल और गेमिंग अपनी जगह हैं, लेकिन शारीरिक विकास का विकल्प नहीं बन सकते। मैदान में खेलने से फिटनेस, आत्मविश्वास और सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है। बच्चों को हर दिन कुछ समय आउटडोर खेलों के लिए देना चाहिए। यही भविष्य के खिलाड़ियों की पहली पाठशाला है
-राहुल सिंह, पूर्व हॉकी ओलंपियन