पाण्ड्य नरेश की जिज्ञासा पर गंगा जी ने यह रहस्य बताया कि उनका घर काशी में है। गंगा जी ने बताया कि अपने प्रवाह के क्रम में वह शिव की जटाओं से मुक्त हो हिमालय शिखरों से उतर प्रयाग होते हुए काशी की सीमा पर पहुंचीं। प्रयाग में यमुना की जलराशि को भी धारण कर मां गंगा का स्वरूप अत्यंत विशाल हो गया था। मां गंगा बड़े बड़े नगर, वन, पर्वत इत्यादि प्रवाहित कर मंथर गति से काशी की सीमाओं तक पहुंचीं।
काशी के पुराधिपति भगवान विश्वनाथ जी ने विशाल जलराशि लेकर भूमि को स्वयं में समाहित करती हुई गंगा जी के प्रवाह से काशी के अस्तित्व को संकटापन्न समझ गंगा जी को काशी सीमा पर ही बांध दिया और उनका प्रवाह उलट कर उन्हें उत्तरवाहिनी प्रवाहित कर दिया। इससे गंगा जी का सम्राट सगर के पूर्वजों के भस्म होने के स्थल तक जाने का मार्ग अवरूद्ध हो गया।
भगीरथ को गंगावतरण से अभीष्ट पूर्वजों की मुक्ति का अपना मनोरथ असिद्ध होता जान पड़ा। मनोरथ की सफलता के लिए भागीरथ के अनुनय पर मां गंगा ने भी भगवान विश्वनाथ से प्रवाह मुक्त करने की याचना की। तब भगवान विश्वनाथ ने मुक्त प्रवाह हेतु गंगा जी से तीन वचन लिए, प्रथम यह कि गंगा जी काशी के घाटों को अपने प्रवाह से क्षतिग्रस्त नहीं करेंगी।
दूसरा यह कि गंगा जी का कोई जलीय जंतु काशी में मनुष्यों को क्षति नहीं करेगा। श्री विश्वनाथ जी ने तीसरा वचन यह लिया कि गंगा जी अपने साक्षात देवी स्वरूप में काशी में ही विराजेंगी। तब से काशी ही गंगा जी का घर है।