नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि घाट के किनारे बढ़ते पर्यटन से वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण में जाने-अनजाने में बढ़ावा मिल रहा है। घाट कि घाट किनारे हवा में जहर घुलने का एक प्रमुख कारण डीजल इंजन से चलने वाली नौकाएं हैं। इसके चलते जलीय जीवों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
घाट किनारे योग करना भी घातक
आयुर्वेद महाविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार का कहना है कि योग करने के दौरान हमारा शरीर वायु की अधिकतम मात्रा ग्रहण करता है। ऐसे में ऑक्सीजन के साथ प्रदूषण के घातक कण फेफ ड़े तक पहुंच जाते हैं। इस लिहाज से घाट किनारे सुबह-सुबह योग करना भी रोग का कारण बन सकता है। खतरनाक कण हमारे रक्त में घुलकर घातक बीमारियों को जन्म देते हैं।
ई-बोट की कोशिश रही नाकाम
गंगा में जल और किनारे पर वायु प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए ई बोट की योजना बनी थी। चार अप्रैल 2017 को तत्कालीन मंत्री गिरिराज सिंह ने प्रतीक स्वरूप कुछ नाविकों को ई-बोट बांटी भी थी, लेकिन ई-बोट अपेक्षा के अनुरूप गंगा की स्थानीय परिस्थिति में फि ट नहीं बैठी। बेहद हल्की होने से इसे खतरनाक भी माना गया।