वाराणसी। सन 1942 में महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के समय 26 जनवरी को जिला कारागार में जेल की छत पर लगे खपड़ैल को पीसकर हम लोगों ने केसरिया रंग बनाया और पेड़ों की पत्तियों से हरा रंग तैयार किया। जेल की सफेद वर्दी पर उसे लगा कर उसे तिरंगा बना कर पेड़ पर चढ़ कर तिरंगा झंडा फहराया था। साथ ही स्वतंत्रता सेनानी मां भारती की आकृति बनाई थी। ये बातें 97 साल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धन्य कुमार जैन ने अमर उजाला को बताईं तो उनकी आंखों में चमक सी आ गई।
धन्य कुमार जैन ने बताया कि अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर कई महीने तक जिला कारागार में रखा गया और फिर जेल से रिहा कर दिया गया। 15 अगस्त 1947 को देश को आजाद करा कर गांधी जी ने देश की जनता को सौंप दिया। लेकिन देश की ऐसी दशा हम लोगों ने नहीं सोची थी। आज अपने देश में चारों तरफ करप्शन फैसला हुआ है। उन्होंने बताया कि गांधी जी ने देश की आजादी को देश की जनता के हाथों सौंप दिया था जिसका वर्तमान पीढ़ी सदुपयोग नहीं कर पा रही है।
धन्य कुमार जैन अब ठीक से सुन नहीं पाते, लेकिन देश की आजादी की लड़ाई के बारे में बड़े ही खुशी से वह बताते हैं। कहा कि गांधी जी के द्वारा कोई भी आंदोलन चलाया जाता था तो उसमें बनारस के कई स्वतंत्रता सेनानी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। स्वतंत्रता सेनानियों का नारा हुआ करता था एक चवन्नी चांदी की जय बोलो महात्मा गांधी की... इसके साथ ही आजादी की लड़ाई के वक्त अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा प्रेस पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उस वक्त स्वतंत्रता सेनानी अपने हाथ से कागज का पंफलेट बनाकर उसे जगह-जगह बांटते थे।
स्वतंत्रता सेनानी धन्य कुमार जैन आज भी पत्नी सीता देवी, पांच बेटों और उनके परिवार के साथ किराये के मकान में रहते हैं। अंग्रेजों की हुकूमत के समय बने मकान की स्थिति भी अब जर्जर हो चुकी है। उनके पांच पुत्र निजी व्यवसाय कर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। जबकि वे सरकार की पेंशन पर निर्भर है। परिवार के लोगों ने बताया कि न ही कभी कोई जनप्रतिनिधि आता है और न ही कोई अधिकारी। चलने फिरने में असमर्थ धन्य कुमार जैन कुछ वर्षों से घर में ही रहते हैं। परिवार के लोगों ने बताया कि देश आजाद होने के बाद उन्हें सरकार की ओर से जीवन व्यापन के लिए सरकारी गल्ले की दुकान दी गई थी। जिसे 1991 में सरकार ने वापस ले लिया।