यही नहीं, शव के साथ आने वाले लोग घाट पर ही मलमूत्र त्यागते हैं, जो सीधे गंगा में ही जाता है। तीर्थ पुरोहित कन्हैया पंडित ने बताया कि 30 साल में गंगा की दुर्दशा ही हुई है।
हम लोग गंगा किनारे तीन-तीन घंटे बैठकर संध्या करते थे लेकिन अब दस मिनट बैठना भी मुश्किल हो जाता है। शाम होते ही बदबू बढ़ जाती है। घाट पर दुकान लगाने वाले गंगा की मौजूदा दशा से बहुत आहत हैं।
सतुआ बाबा आश्रम के महामंडलेश्वर संतोष दास का कहना है कि पुराणों में मान्यता है कि अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों का प्रवाह जल में किया जाता है लेकिन चिता की राख, कोयला, कपड़ा भी गंगा में प्रवाहित करने की परंपरा मानव ने खुद बना ली है। काशी में गंगा नहीं रही तो कैसे पुण्य कमाएंगे।
गंगा संरक्षण के लिए सख्त नियम बनाने होंगे। वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। गंगा जिस दिन चली जाएंगी हमारी संस्कृति, सभ्यता, धर्म, सत्ता और समाज सभी का विनाश हो जाएगा। गंगा के लिए पांच साल की सरकारों से हम अपेक्षा नहीं कर सकते। सजग नहीं हुए तो हमने तो गंगा को देख लिया आने वाली पीढ़ी गंगा को नहीं देख पाएगी।
पौराणिक मान्यता के अनुसार विश्व का प्रथम कुंड चक्रपुष्करिणी तीर्थ भी मणिकर्णिका घाट पर है। काशी की उत्पति भी इसी घाट से हुई थी। यह कुंड गंगा के पहले से ही यहां है। मान्यता है कि भगवान शिव और शक्ति ने इसी कुं ड में स्नान किया था।
शिव और शक्ति द्रवीभूत स्वरूप में इस कुंड में विराजमान रहते हैं। गंगा के जलस्तर में गिरावट के कारण कुंड सूखने के कगार पर है। इसी घाट पर जगद्गुरु शंकराचार्य का भगवान शिव के साथ शास्त्रार्थ हुआ था और रामकृष्ण परमहंस को शिव का प्रथम दर्शन भी यहीं हुआ था।
गंगा सफाई और जागरूकता के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से हर महीने 25 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। फिर भी न तो घाटों पर गंदगी रुक रही है, न ही गंगा में कचरा फेंकना रुका है। गंगा में गंदगी फैलने से रोकने और लोगों को जागरूक करने के लिए नगर निगम ने चार स्वयंसेवी संगठन लगाए हैं।
इन संगठनों को छह जोन में बांटकर जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है। नगर निगम ने घाटों की सफाई की जिम्मेदारी आईएलएफएस को दी है। तीन साल के लिए लगभग 25 करोड़ की धनराशि संस्था को दी गई है। इसके बाद भी घाटों पर छुट्टा पशु घूमते रहते हैं। गोबर फैला रहता है।