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1978 की बाढ़: बह गए थे 400 मकान, 13 की मौत, डूबी थी 51 हजार हेक्टेयर फसल; राहत कार्य में लगी थी सेना

Wed, 06 Aug 2025 10:31 AM IST
अमन विश्वकर्मा राहुल दुबे, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Flood in Varanasi: वाराणसी में गंगा और वरुणा नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। पुरनिए इसे देखते हुए 1978 का समय याद कर रहे हैं। वे बताते हैं कि उस समय बाढ़ की भयावहा की शुरुआत इसी तरह हुई थी। राहत कार्य के लिए सेना के जवाओं को तैनात कर दिया गया था।
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जगरनाथ, चंपा देवी और त्रिलोकी प्रसाद ने बताया 1978 का माहाैल। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Flood in UP: वाराणसी जिले में 1978 में आई बाढ़ ने सबसे अधिक तबाही मचाई थी। 1978 में 14 सितंबर में आई बाढ़ में 337 मकान बाढ़ में बह गए थे। सितंबर के अंत तक यह आंकड़ा 400 तक पहुंच गया था। वहीं, 13 लोगों की मौत हुई थी और 51 हजार हेक्टेयर फसल डूब गई थी। वहीं, 200 से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में थे। उस समय राहत कार्यों में लगाने के लिए सेना को बुलाया गया था। 

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उस वक्त शहर के जगतगंज, इंग्लिशिया लाइन और बजरडीहा क्षेत्र तक बाढ़ का पानी आ गया था। शहर के हिस्सों में 40 नावों को लगाकर एक हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित जगह पर ले जाया गया था। शिक्षा संस्थानों में छुट्टी घोषित कर दी गई थी और शहर के कई हिस्सों में बिजली आपूर्ति पूरी तरह से ठप कर दी गई थी। 

करीब 96 गांव पूरी तरह जलमग्न हो गए थे। यहां मदद के लिए सेना की चार नावें लगाई गई थीं। उस समय उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हिसा था और कुल 56 जिलों में 50 जिले बाढ़ग्रस्त घोषित किए गए थे। शहर के अंदर आवागमन लगभग बंद था। 

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सड़कों पर बाढ़ और बारिश का पानी। - फोटो : अमर उजाला
गांवों में भरभराकर कर गिर रहे थे मकान
73 वर्षीय जगरनाथ कन्नौजिया ऊर्फ जगई कहते हैं कि 1978 में आई बाढ़ ने गांवों में बहुत तबाही मचाई थी। गांवों में कच्चे मकान भरभराकर गिर रहे थे। कई जहरीले जीव निकल आते थे। पूरी रात लाठी और टाॅर्च लेकर निगरानी करनी पड़ती थी। चौबेपुर पिपरी, मठिया, हरिहरपुर, धौरहरा, टेकुरी, लक्ष्मीसेनपुर, भगवानपुर में पोखरे का पानी सड़क तक आ गया था। बिजली नहीं होने से चारों ओर अंधेरा रहता था। आज तो बहुत सुविधाएं हैं। 

मणिकर्णिका घाट की छतों पर शवदाह। - फोटो : अमर उजाला
नाव से चलते थे लोग
कछवा रोड सेवापुरी ब्लॉक के ठटरा गांव की 85 साल की चंपा देवी बताती हैं कि 1978 के बाढ़ के दौरान ठटरा गांव के लोग बाजार करने के लिए नाव से गांव आते थे। बाढ़ के दौरान हनुमान मंदिर के पास से नाव बिंद बस्ती तक चलती थी। हमारे यहां तेल का कोल्हू चलता था। तेल पेराई और खरीदारी के लिए गांव वाले हमारे यहां खुद नाव पर चलकर आते थे। लोग नौ किलोमीटर तक नाव से सफर करते थे। 
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ड्रोन से ली गई बाढ़ की फोटो। - फोटो : अमर उजाला
बच्चों को कंधे पर ले जाते थे स्कूल
75 साल त्रिलोकी प्रसाद सिंह बताते हैं कि उस समय बाढ़ बहुत भीषण थी। गोदौलिया पर किराये पर रहते थे। बच्चे केंद्रीय विद्यालय बरेका में पढ़ने जाते थे। उस समय बच्चों को कंधे पर बिठाकर स्कूल तक लेकर आते थे। पूरा शहर लगभग ठहर गया था। सड़कों पर नाव चलती थी, लेकिन उसके रूट तय थे। कहीं कोई मकान गिर जाता था तो एक दिन बाद ही पता चल पाता था कि किसी मोहल्ले में कहीं कोई मकान गिर गया है। इससे काफी दिक्कत होती थी।

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