सड़कों पर बाढ़ और बारिश का पानी।
- फोटो : अमर उजाला
गांवों में भरभराकर कर गिर रहे थे मकान
73 वर्षीय जगरनाथ कन्नौजिया ऊर्फ जगई कहते हैं कि 1978 में आई बाढ़ ने गांवों में बहुत तबाही मचाई थी। गांवों में कच्चे मकान भरभराकर गिर रहे थे। कई जहरीले जीव निकल आते थे। पूरी रात लाठी और टाॅर्च लेकर निगरानी करनी पड़ती थी। चौबेपुर पिपरी, मठिया, हरिहरपुर, धौरहरा, टेकुरी, लक्ष्मीसेनपुर, भगवानपुर में पोखरे का पानी सड़क तक आ गया था। बिजली नहीं होने से चारों ओर अंधेरा रहता था। आज तो बहुत सुविधाएं हैं।
मणिकर्णिका घाट की छतों पर शवदाह।
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नाव से चलते थे लोग
कछवा रोड सेवापुरी ब्लॉक के ठटरा गांव की 85 साल की चंपा देवी बताती हैं कि 1978 के बाढ़ के दौरान ठटरा गांव के लोग बाजार करने के लिए नाव से गांव आते थे। बाढ़ के दौरान हनुमान मंदिर के पास से नाव बिंद बस्ती तक चलती थी। हमारे यहां तेल का कोल्हू चलता था। तेल पेराई और खरीदारी के लिए गांव वाले हमारे यहां खुद नाव पर चलकर आते थे। लोग नौ किलोमीटर तक नाव से सफर करते थे।
ड्रोन से ली गई बाढ़ की फोटो।
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बच्चों को कंधे पर ले जाते थे स्कूल
75 साल त्रिलोकी प्रसाद सिंह बताते हैं कि उस समय बाढ़ बहुत भीषण थी। गोदौलिया पर किराये पर रहते थे। बच्चे केंद्रीय विद्यालय बरेका में पढ़ने जाते थे। उस समय बच्चों को कंधे पर बिठाकर स्कूल तक लेकर आते थे। पूरा शहर लगभग ठहर गया था। सड़कों पर नाव चलती थी, लेकिन उसके रूट तय थे। कहीं कोई मकान गिर जाता था तो एक दिन बाद ही पता चल पाता था कि किसी मोहल्ले में कहीं कोई मकान गिर गया है। इससे काफी दिक्कत होती थी।