घाटों किनारे पिलर लगाना बना चुनौती, आठ क्विंटल का है पिलर
वाराणसी में गंगा घाटों पर पिलर लगाना सिंचाई विभाग के लिए चुनौती बना है। कारण, इन इलाकों में पिलर ले जाना मुश्किल है क्योंकि एक पिलर आठ क्विंटल का है। इसे गलियों से घाटों तक ले जाना मुश्किल है। अधिशासी अभियंता ने बताया कि घाट क्षेत्र में पिलर लगाने की व्यवस्था की जा रही है। नाव के जरिये निर्माण सामग्री ले जाई जाएगी। जहां पिलर लगने होंगे वहीं ढलाई की व्यवस्था की जाएगी।
बाढ़ से जान-माल के नुकसान होंगे कम
एनजीटी का तर्क है कि जिलास्तर पर फ्लड जोन तय होने से आपसी विवादों में कमी आएगी। एनजीटी के तय फ्लड जोन से बाढ़ से होने वाले जान-माल के नुकसान कम हो जाएगी। भूजल रिचार्ज, बाढ़ और भारी बारिश से पानी रिहायशी इलाकों में नहीं घुसेगा। नदी की प्राकृतिक एवं उसके किनारे की जैव विविधता को बचाने में मदद मिलेगी।
वरुणा-असि को भी फ्लड जोन में करने की तैयारी
गंगा की सहायक वरुणा और असि नदी का भी सर्वे चल रहा है। इसे भी फ्लड जोन में शामिल किया जाएगा। सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता सुरेश चंद्र आजाद ने बताया कि एनजीटी के निर्देश पर तय एजेंसी इन नदियों का सर्वे कर रही हैं। रिपोर्ट मिलने के बाद शासन से पिलर व साइनेज बोर्ड लगाने के लिए बजट की मांग की जाएगी।
तस्वीर खींचने के बाद सटीक स्थान दिखता है
एनजीटी के तय मानक के तहत ही पिलर लगाए जा रहे हैं। नोटकेम एप के जरिये स्थान की तस्वीर खींचने के बाद अक्षांश-देशांतर (सटीक स्थान) दिखता है फिर पिलर व साइनेज बोर्ड लगाए जाते हैं।
फ्लड जोन जो भी स्थल आ रहे हैं, वहां पिलर लगाए जा रहे हैं। इनमें घाटों के किनारे के मंदिर, मठ और आवासीय इलाके शामिल हैं। गंगा किनारे के समतल या निचला भाग जो हमेशा बाढ़ में डूब जाता है उसे नदी का अनिवार्य हिस्सा मानकर एनजीटी संरक्षित करवा रही है। इस तय दायरे में निर्माण पर रोक रहेगी। निर्माण कराने पर कानूनी कार्रवाई होगी। - सुरेश चंद्र आजाद, अधिशासी अभियंता, सिंचाई विभाग