माई सिटी रिपोर्टर वाराणसी। दीपावली दीयों का त्योहार है और पटाखे जलाकर इसे मातम का त्योहार ना बनाएं। कुछ लोगों ने मनोरंजन के लिए इस पटाखे को पर्व और धर्म से जोड़ दिया है। पटाखे से दुर्गंध, बीमारी, हिंसा और वैमनस्य ही बढ़ता है लिहाजा बच्चों के साथ ही बड़ों को भी इस दिशा में सक्रिय होना पड़ेगा।
ये बातें ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अभियान चला रही संस्था सत्या फाउंडेशन के संस्थापक सचिव चेतन उपाध्याय ने मंगलवार को भेलूपुर में प्रेसवार्ता में कहीं। चेतन उपाध्याय ने कहा कि पटाखा किसी भी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। जब देश की हरियाली 33% थी, उस समय पेड़-पौधे, शोर और वायु प्रदूषण को सोख लेते थे मगर आज बनारस की हरियाली 1% से भी कम है। यह एक दिन का शौक हमें बहुत ज्यादा आतंकित और प्रताड़ित कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक दीपावली की रात केवल दो घंटे यानी रात 8 से 10 तक ही आतिशबाजी की जा सकती है। अगर नियमों का पालन ठीक ढंग से हो जाए तो प्रदूषण भी कम होगा और शोर के विरोध में हिंसा कम होने से पुलिस और न्यायालय का बोझ भी नहीं बढ़ेगा।