इस पर कोर्ट ने उक्त पांचों अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ पांचों अधिकारियों ने हाईकोर्ट में वाद दाखिल किए। वहां से राहत नहीं मिली तो इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट भी गए। लेकिन वहां भी खारिज हो गया। फिर भी उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं हो रहा था। इस पर बृजेंद्र सिंह यादव ने हाईकोर्ट में कोर्ट आफ कंटेंम्प्ट किया था।
हाईकोर्ट ने उक्त पाचों अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। अब मुकदमे की छानबीन की जा रही है। देखा जाए तो बृजेंद्र सिंह यादव के मुताबिक पुलिस के उच्चाधिकारियों द्वारा 22 जुलाई 1961 में दि कमेटी फार द वेलफेयर आफ द फैमलीज आफ द मेम्बर्स आफ द पुलिस फोर्स इन यूपी (लखनऊ) नामक संस्था पंजीकृत कराई गई।
इसमें पुलिस के उच्चाधिकारियों ने अपनी-अपनी पत्नियों को पदाधिकारी बनाया। फिर पुलिस कर्मियों के वेतन से 25 रुपये प्रति कर्मचारी प्रतिमाह अवैध कटौती समिति के नाम से करने लगे, जबकि पुलिस कर्मचारी इस समिति के सदस्य भी नहीं थे। इस कटौती की राशि प्रति वर्ष तकरीबन 10.5 करोड़ रुपये होती रही। पांच वर्ष बाद समिति अपंजीकृत हो गई फिर भी अपंजीकृत संस्था के नाम पर वसूली जारी थी।