भादो मास के त्योहारों का आगाज रविवार को कजरी की पूर्व संध्या पर हुए रतजगा उत्सव से हुआ। शहर से लेकर गांव तक महिलाओं ने कजरी गीतों के जरिये रिश्तों में मिठास घोली। कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया बदरिया घेरी आइल ननदी... जैसी पारंपरिक कजरी भी खूब गूंजी।
पर्व के विशेष व्यंजन जलेबा का भी जमकर लुत्फ उठाया गया। मोहल्लों और चौराहों पर सजीं जलेबा की दुकानों पर खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ी। लोगों ने जलेबा खरीदा और अपनों के बीच बांटकर पर्व की खुशियां साझा कीं। इस दौरान दो से चार किलो तक के जलेबा तैयार किए गए। बाजार में जलेबा 150 से 200 रुपये किलो तक बिका।
कजरी से एक दिन पहले होने वाले रतजगा की परंपरा शहर से लेकर गांव तक निभाई गई। महिलाओं ने समूह बनाकर देवी वंदना के साथ कजरी गायन की शुरुआत की। इसके बाद देर रात तक कजरी गीत गाने और थिरकने के साथ जलेबा का आनंद लिया। रातभर जलेबा की मिठास घुलती रही और महिलाओं की टोलियां भादो की फुहार के बीच कजरी की तान छेड़ती रहीं।
लहुराबीर, चेतगंज, सिगरा, महमूरगंज, पांडेयपुर, दशाश्वमेध घाट, चौक, मैदागिन, विशेश्वरगंज, भोजूबीर, अर्दली बाजार, लहरतारा, बौलिया, चांदपुर और सारनाथ समेत कई इलाकों में जलेबा की दुकानें सजीं। देर रात तक जलेबा की बिक्री होती रही। साहित्यकार हीरालाल मिश्र ने बताया कि कजरी के उल्लास की शुरुआत रतजगा से ही होती है।