वाराणसी। अधिक मास के दौरान अगर किसी खास वजह से व्रत या उपवास नहीं कर पा रहे और मंदिर नहीं जा पा रहे हैं तो घर पर ही भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की मानस पूजा कर सकते हैं। ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि विष्णु धर्मोत्तरपुराण के मुताबिक भगवान का ध्यान कर के मन ही मन पूजा की जा सकती है। इसे मानस पूजा कहा जाता है। ऐसा करने से भी उतना ही फल मिलता है जितना अन्य तरह से पूजा करने पर मिलता है।
आचार्य गणेश मिश्र का कहना है कि मानस पूजा में भगवान को मन ही मन या कल्पनाओं में ही आसन, फूल, नैवेद्य, आभूषण और अन्य चीजें चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है। इसके लिए किसी भौतिक चीज की जरूरत नहीं होती है। बस साफ और निश्छल मन होना जरूरी है, जिससे पूजा का हजार गुना फल मिलता है। इसलिए पुराणों में भी मानस पूजा को महत्वपूर्ण माना गया है।
मानस पूजा के मंत्र और उनका अर्थ
मानस पूजा करते समय भगवान का ध्यान करना चाहिए और मन ही मन मंत्र बोलकर उनके अर्थ के मुताबिक भावना से भगवान की पूजा करनी चाहिए।
अधिक मास में क्या करना चाहिए
ज्योतिषाचार्य पंडित दीपक मालवीय का कहना है कि अधिमास में हर दिन सूर्योदय से पहले उठकर नहाना चाहिए। तीर्थ स्नान करना चाहिए। आंवले और तिल का उबटन लगाकर नहाना चाहिए। पानी में तिल मिलाकर नहाना चाहिए। सूर्य को जल चढ़ाकर योगा और ध्यान करना चाहिए। भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के नामों का जाप करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों को खाने की चीजें और मौसमी फलों का दान करें। शाम के समय दीपदान करना चाहिए।
अधिक मास में क्या करने से बचें
पंडित गणेश का कहना है कि इस महीने में शारीरिक और मानसिक रूप से अपवित्र होने से बचना चाहिए। तामसिक चीजें यानी लहसुन-प्याज और मांसाहार जैसी चीजें नहीं खानी चाहिए। आलस्य और हर तरह के नशे से दूर रहना चाहिए। देर तक नहीं सोना चाहिए। खास तरह के विशेष कामना से अनुष्ठान नहीं करना चाहिए।
हर तरह के मांगलिक कामों की होती है मनाही
काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो राम यतन शुक्ला ने बताया कि अधिक मास को हिंदू धर्म में बहुत ही खास माना गया है। भारत में खगोलीय गणना के मुताबिक हर तीसरे साल एक अधिक मास होता है। इसे अधिमास, मलमास या पुरुषोत्तममास भी कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर में हर महीने के स्वामी देवता बताए गए हैं। लेकिन इस तेरहवें महीने का स्वामी कोई नहीं है। इसलिए इस महीने में हर तरह के मांगलिक कामों को करने की मनाही है। देवी भागवत पुराण का कहना है कि इस महीने में तीर्थ स्नान का बहुत ही महत्व होता है। इस महीने में भागवत कथा सुनने का भी बहुत महत्व है।