वाराणसी। मां की हथेलियों की छांव जहां आपको वात्सल्य का एहसास कराती है, तो पिता अंगुली थामकर सुरक्षा का भरोसा दिलाते हैं। पिता कभी फटकारते हैं, तो कभी दुलारते हैं। सच में यह उनके सिखाने का अलग अंदाज होता है। वह जिंदगी की सीख सिखाते हैं। मायने बताते हैं और अनुभव का निचोड़ सामने रखते हैं। पिता की सीख से जिंदगी ऐसे संवारती है कि कामयाबी कदम चूमने लगती है।
मजबूत इच्छाशक्ति से हासिल होती है मंजिल
मैं आज जो भी हूं मेरे पिताजी चंद्रभान सिंह की गाइडेंस की बदौलत हूं। उन्हें धन्यवाद कहना अपने आप में एक छोटा शब्द होगा। मुझे आज भी याद है जब मैं कक्षा नौ में था, वह मुझे रात के दो बजे जगा देते थे और ठंडे पानी से आंख धुलाने के बाद लालटेन जलाकर मुझे बैठाकर पढ़ाई कराते थे। पढ़ाई हो या जीवन उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि हमारी इच्छा शक्ति मजबूत हो और कर्म करने की क्षमता हो तो हम किसी भी मंजिल को हासिल कर सकते हैं। उनकी दी हुई सीख मुझे हमेशा याद रहेगी। पिताजी खुद एक शिक्षक थे, जो बच्चों की शिक्षा में हमेशा मदद करते थे। वह कहते थे शिक्षा ही इंसान का जीवन बदल सकती है। पिताजी की यह बातें मुझे इतनी प्रेरणा दे गई कि मैंने ठान लिया कि शिक्षा के क्षेत्र में उच्च पद पर पहुंचकर इसके जरिये लोगों की जिंदगी बदल सकूं । उम्र के इस पड़ाव पर भी पिताजी साइकिल से ही चलते हैं, जो उनकी सादगी भरे जीवन को दर्शाता है। -राकेश सिंह, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी
अब मेरा भविष्य तुम्हारे हाथ में है शब्दों की ऊर्जा न्यून हो जाएगी
जब मैं स्वयं के जीवन में पिता के सहयोग की कल्पना मात्र करूं। पिता जी शुरू से ही एक मित्र की तरह बनकर रहें। हर दिन जिंदगी में नए अनुभव के साथ एक खट्टा मीठा रिश्ता है मेरे पापा का। उनके प्रेम का प्रमाण है कि उन्होंने हर पल हर बार मुझे खुद से ज्यादा समझा है। दूसरे शहर में जब भी रहना हुआ, हमसे बात करते हुए अक्सर आवाज में कसक सी दिखी, जो उनमें एक खालीपन को सदैव उजागर करती रही। काशी विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में पत्रकारिता में स्वर्ण पदक लेने के दौरान पापा की आंखों में आंसू और खुशी दोनों ही देखा। पापा हमेशा यही कहते हैं कि अब मेरा भविष्य तुम्हारे हाथों में है, बस उसी सफर पर निकल चुका हूं। आशा है जल्द पापा के इस सपने को पूरा कर पाऊंगा। मेरी जिंदगी में प्रत्यक्ष देवता की प्रथम उपाधि उनकी ही है। मैं अभी जो कुछ भी हूं और आगे जो कुछ भी हासिल होगा, उसके पीछे सबसे बड़ी ताकत मेरे पापा हैं और सदैव रहेंगे। मैं यही कामना करता हूं कि निरंतर जीवन पर्यंत यह मार्गदर्शन मुझे मिलता रहे। -शाकंभरी नंदन सोंथालिया, समाजसेवी
कभी भी निराश होना नहीं सिखाया
मेरे पिताजी स्व. प्रभाशंकर अवस्थी ने कभी मुझे निराश होना नहीं सिखाया। चाहे कितनी विषम परिस्थितियां हों, कितनी बड़ी चुनौती हो वह सदैव यही कहते कोशिश करो, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। जब मैंने 12वीं जीवविज्ञान से करने के बाद बीकाम में दाखिला लिया और मुझे कुछ समझ में नहीं आता था। जब मुझे खुद पर विश्वास नहीं था कि मैं कुछ कर पाऊंगी। मुझे उनके शब्द आज भी याद हैं, मुझे तुम्हारे ऊपर भरोसा है, तुम कर सकती हो। तुम्हें मेरे भरोसे पर भरोसा नहीं है बेटा जी। जब भी मैं कभी उनसे कॅरियर के बारे में बात करती तो वह हमेशा कहते, संभावनाएं अपार हैं, सीमाएं असीमित हैं। मैं पल-पल ध्येय बदलती रही लेकिन पिताजी ने हमेशा विश्वास बनाए रखा। वह कहते थे कि महिलाओं को सदैव ऐसी जगह होना चाहिए, जहां उनका सभी सम्मान करें, कोई उन्हें कभी अपमान के दो शब्द कभी न कह सके। -प्रियंका अग्निहोत्री, गीत, लेखिका
वह मार नहीं पिताजी का प्यार था
पिताजी के दिए संस्कार और शिक्षाएं आज भी पथ प्रदर्शन करती हैं। राजनीति में जब मैंने कॅरियर शुरू किया तो पिताजी ने यही कहा था कि देखो ना किसी का पैसा लेना और ना किसी के साथ धोखा करना। जब मैं छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहा था तो उन्होंने चेतावनी दी थी कि ऐसा कोई गलत काम नहीं करना, जिससे कोई दरवाजे पर शिकायत करने आए। उन्होंने कभी राजनीति में जाने से नहीं रोका। महामृत्यंजय मंदिर के महंत होने के कारण उनसे सनातन धर्म के संस्कार बचपन से ही मिले। उन्होंने जरूरतमंदों की मदद का जो सिलसिला शुरू किया उसका पालन हम लोग भी कर रहे हैं। समाजसेवा और राजनीति का ककहरा तो उन्होंने ही सिखाया। पिताजी मोहन लाल दीक्षित के द्वारा दिए गए इन संस्कारों का हमने राजनीति में भी पालन किया। बचपन में अक्सर गलतियों पर मार भी खानी पड़ती थी लेकिन प्यार भी उतना ही मिलता था। अब सोचते हैं तो लगता है कि वह मार नहीं पिताजी का प्यार ही था। -किशन दीक्षित, समाजसेवी