जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा/तासु दुगुन कपि रूप देखावा/रामदूत मैं मातु जानकी/सत्य सपथ करुनानिधान की/यह मुद्रिका मातु मैं आनी/दीन्हि राम तुम्ह कहं सहिदानी/जाके डर अति काल डेराई/सो सुर असुर चराचर खाई/रहा न नगर बसन घृत तेला/बाढ़ी पूंछ कीन्ह कपि खेला/उलटि पलटि लंका सब जारी/कूदि परा पुनि सिंधु मझारी....। रामनगर की रामलीला में लंका दहन की लीला देखने के लिए मंगलवार को लीला प्रेमियों का सैलाब उमड़ पड़ा। लंका के मैदान में हाथी पर सवार होकर काशिराज अनंत नारायण सिंह ने लीला देखी।
लीला की शुरुआत हनुमान के मैनाक पर्वत पर चढ़ने से हुई। उनके चढ़ते ही पर्वत धंस जाता है। उधर, हनुमान को देख सुरसा प्रसन्न होती है। वह कहती है कि आज मुझे अच्छा आहार मिल गया है। हनुमान जी निवेदन करते हैं कि मैं श्रीराम के काम से सिंधु पार जा रहा हूं। मुझे वापस आने पर तुम खा लेना। लेकिन सुरसा कभी एक, कभी सोलह तो कभी 32 योजन भर मुंह फैलाकर हनुमान को खाने के लिए तैयार रहती है। हनुमान भी उसी तरह अपना रूप बदलने लगते हैं। सुसरा जब वृहद रूप धारण करती है तब तब वह लघु रूप धरकर उसके मुंह में प्रवेश कर बाहर निकल जाते हैं।
आगे छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध करते हुए वह सुबेल पर्वत पर पहुंच जाते हैं। वहां लंका के भव्य रूप का वह दर्शन करते हैं। हनुमान प्रभु को याद कर लंका में प्रवेश करते हैं। हनुमान वहां सीता को खोजते हैं लेकिन वह नहीं मिलतीं। वहीं राम -राम स्मरण करते विभीषण मिल जाते हैं। हनुमान विप्र रूप में उनके पास पहुंचते हैं। विभीषण बताते हैं कि नगर में एक अशोक वाटिका है, वहीं सीता मिलेंगी। अशोक वाटिका में सीता को देख वह मन ही मन प्रणाम करते हैं। वहां रावण सीता को अपनी रानी बनाने के लिए उनकी बांह पकड़कर अपनी ओर खींचता है। सीता गुस्से में तमतमाई हुई हैं।
वह रावण को धिक्कारती हैं। उधर, त्रिजटा राक्षसियों को बुरे सपने की बात बताती है। तभी हनुमान पेड़ से सीता के पास राम की मुद्रिका गिरा देते हैं। सीता मुद्रिका उठाती हैं और हनुमान विशाल रूप में प्रगट हो जाते हैं। वह भूख लगने पर पेड़ों को उखाड़ने और राक्षसों को मारने लगते हैं। अक्षय कुमार का वध करने के बाद मेघनाद उनसे मुकाबले के लिए आता है। वह नागफास में बांधकर हनुमान को रावण के दरबार में पेश करता है। रावण के कहने पर हनुमान की पूंछ में राक्षस आग लगा देते हैं। हनुमान लंका के एक महल से दूसरे महल की ओर बढ़ने लगते हैं और आग लगने से कुछ देर में ही सोने की लंका जलकर राख हो जाती है। पूंछ की आग समुद्र में बुझाकर वह लौट आते हैं और राम को सीता के बारे में जानकारी देते हैं।