राम के चरणों में शीश नवाकर सुमंत इस तरह लौटे जैसे कोई मूलधन गंवाकर लौटता है। इधर राम के वियोग में दशरथ के प्राण निकल गए। काशिराज ने दशरथ के मरण की लीला नहीं देखी। अयोध्या नरेश के मरण की लीला राजा नहीं देखते। लीला के इस प्रसंग को चित्रकूट में आरती के बाद रामायणियों ने पूरा किया। उधर, जगत को भव सागर से पार उतारने वाले कृपा सिंधु को पार उतार कर केवट ने अपने जीवन को धन्य कर लिया। उतराई नहीं ली। इस दौरान हर हर महादेव के जयघोष से लीला स्थल गूंजता रहा।
मांगी नाव न केवटु आना/कहइ तुम्हार मरम मैं जाना/चरन कमल रज कहुं सबु कहई/मानुष करनि मूरि कछु अहई/कृपा सिंधु बोले मुसुकाई/सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई/बेगि आनु जल पाय पखारू/होत बिलंबु उतारहिं पारू/ अति आनंद उमगि अनुरागा/चरन सरोज पखारन लागा...। रविवार को पांच से अधिक प्रसंगों की चलायमान लीला देखने के लिए हजारों लोग राजा की सवारी के साथ पारंपरिक वेश में तिलक-त्रिपुंड लगाए, पोथी-पीढ़ा दबाए एक जगह से दूसरी जगह रवाना होते रहे।
रामलीला की शुरुआत रामपुर में निषाद राज आश्रम से हुई। भगवान राम निषादराज से वट का दूध लाने के लिए कहते हैं। राम, लक्ष्मण दोनों भाई सिर पर जटा बांधते हैं। वहां रथ लेकर समझाने गए मंत्री सुमंत राम के वेश को देख विलाप करने लगते हैं। सुमंत कहते हैं कि महाराज दशरथ ने कहा है कि राम, लक्ष्मण को रथ पर बैठाकर गंगा स्नान कराने ले जाना और फिर वन दिखाकर वापस ले आना। वह भगवान राम का पैर पकड़ लेते हैं। कहते हैं कि नाथ वही काम आप करें, जिससे अयोध्यावासी सनाथ हो सकें। राम सीता की ओर निहारकर कहते हैं कि अयोध्या जाकर सास, श्वसुर की सेवा करो। सीता जवाब देती हैं कि सीता अपने स्वामी को वन में छोड़कर नहीं जा सकती। सुमंत लौट आते हैं।
राम, लक्ष्मण, सीता गंगा तट पर पहुंच कर केवट से पार जाने के लिए नाव मांगते हैं। केवट कहता है कि पत्थर की शिला आपके चरणों के स्पर्श से नारी हो गई थी। बिना पांव पखारे मैं पार नहीं उतार सकता। केवट भगवान के पांव पखाकर कर गंगा पार उतारता है। भगवान उस पार रेता में खड़े होकर उसे अपने हाथ की मुंदरी उतराई में देने लगते हैं। केवट कहता है कि हे प्रभु आप भी केवट हैं और मैं भी। एक केवट दूसरे केवट से उतराई कैसे ले सकता है। भगवान चित्रकूट पहुंचकर मंदाकिनी में स्नान करते हैं।