बैठकखाने की छत को बांस-बल्ली लगाकर रोका गया था। आंगन में पानी टपक रहा था। सीढ़ियां जर्जर हो चुकी थीं। तीसरे तल्ले पर जब हम उस्ताद के इबादतखाने में पहुंचे तो वहां सन्नाटा था। कमरे में ऐसा कोई निशान नहीं था, जिससे पता चले कि यह वही जगह है, जहां सुकून भरी नींद के लिए उस्ताद ने अमेरिका में बसने का निमंत्रण ठुकरा दिया था। उस्ताद की पौत्र वधू नजमी फिरोजन ने बताया कि मकान का रिनोवेशन कराया जा रहा था, इसलिए सारा सामान दूसरे कमरे में रखवाया है।
उन्होंने बताया कि दादा अब्बा के जाने के बाद सब कुछ बदल गया। अब हमें कोई नहीं पूछता। आर्थिक हालत बेहद खराब है। लोग समझते हैं कि बिस्मिल्लाह खां का परिवार है तो बहुत पैसा होगा। पोते नासिर ने कहा- घर की स्थिति ऐसी है कि कैसे परिवार का पेट पालें, हम यही सोच नहीं पा रहे हैं।
आमदनी का कोई जरिया नहीं है। कोई सिर पर हाथ रखने वाला नहीं है। साल में एक या दो प्रोग्राम होते थे, लेकिन लॉकडाउन में तो वह भी बंद है। दादा को बहुत से पुरस्कार मिले, लेकिन आज उसकी कोई कीमत नहीं है। आज भी उनका जूता, छाता, टेलीफोन, कुर्सी, लैंप, चम्मच और बर्तन रखे हुए हैं।