चांसलर और वाइस चांसलर की भूमिका में होता था प्रो-चांसलर
चांसलर, प्रो-चांसलर, वाइस चांसलर का पद भारत के गवर्नर जनरल के द्वारा नोटिफाई होकर भारत के गजट में प्रकाशित होता था। इन्हें कोर्ट और सीनेट का सदस्य भी बनाया जाता था। चांसलर को चुनने का अधिकार कोर्ट के पास था। इनका कार्यकाल तीन साल था।
प्रो-चांसलर का चुनाव कोर्ट में से ही एक सदस्यों में से होता था। इनका कार्यकाल एक साल का होता था। चांसलर और वाइस चांसलर की गैर मौजूदगी में उसी पद पर काम करता था। कुलपति बनाने के लिए भी कोर्ट द्वारा चुनाव होता था। इस पर विजिटर की अनुमति ली जाती थी। प्रो-वाइस चांसलर भी कोर्ट द्वारा चुना जाता था। कोर्ट जब तक चाहे इन्हें इस पर पद बनाए रख सकती थी।
अक्तूबर 1917 में कोर्ट की पहली बैठक
वर्तमान में बीएचयू के संचालन में एग्जीक्यूटिव काउंसिल और एकेडमिक काउंसिल की भूमिका होती है। जबकि 1916 में विश्वविद्यालय चलाने के लिए कोर्ट, काउंसिल, सीनेट और सिंडीकेट होते थे। बीएचयू में कोर्ट की पहली बैठक अक्तूबर 1917 में हुई थी।
कोर्ट बीएचयू की सुप्रीम गर्वनिंग बॉडी और सीनेट एकेडमिक बॉडी थी। कोर्ट सीनेट के कार्यों की समीक्षा और उनको वैधता देता था। कोर्ट की एग्जीक्यूटिव संरचना को काउंसिल कहा जाता था। भारत का गवर्नर जर्नल बीएचयू का लॉर्ड रेक्टर भी कहा जाता था।
वहीं, लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल को बीएचयू का विजिटर माना जाता था। एक विजिटर को इतना अधिकार था कि वह कभी भी बीएचयू और इसके कॉलेजों की जांच कर सकता था। रेगुलेशन और नियमों का पालन हो रहा है कि इसकी रिपोर्ट बना सकता था।