बीएचयू के अर्थशास्त्र विभाग की ओर से दो दिवसीय ऊर्जा सम्मेलन में वक्ताओं ने ऊर्जा के क्षेत्र में होने वाले शोध, बदलावों पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि प्रभावी नीतिगत बदलावों के विचार विश्वविद्यालयों से ही आने चाहिए। ऐसा इसलिए कि क्योंकि और शोधकर्ता ज्ञान सृजन की अग्रिम पंक्ति में कार्यरत होते हैं।
क्लाइमेट कम्पैटिबल ग्रोथ नेटवर्क यूके और पंजाब विश्वविद्यालय के तत्वावधान में हुए कार्यक्रम में कुलपति ने कहा कि कार्बन क्रेडिट, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे मुद्दे अब दूरस्थ नीतिगत अवधारणाएं नहीं रह गए हैं, बल्कि ऐसे विषय हैं जिन पर बीएचयू जैसे संस्थानों में शोध और जनसंपर्क गतिविधियों के माध्यम से सक्रिय रूप से काम हो रहा है।
उन्होंने विभागों से आह्वान किया कि वे पारंपरिक भूमिकाओं से आगे बढ़ें और प्रत्यक्ष रूप से एक सतत समाज के निर्माण में योगदान दें। आईआईटी बॉम्बे के प्रो. के. नारायणन ने ऊर्जा सुरक्षा और सततता को आधार देने वाले आर्थिक और नीतिगत अनिवार्यों पर बात की। भारतीय बायोगैस एसोसिएशन, नई दिल्ली के अध्यक्ष गौरव केडिया ने एनर्जी लैडस्केप, एनर्जी ट्रैन्जिशन पर कहा कि नेट जीरो का आशय पूरी तरह से जीवाश्म ईंधनों को समाप्त कर देना नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारियों, नवाचार और सततता के बीच संतुलन स्थापित करने का है। उन्होंने ‘गोबर बैंक’ पहल जैसे सफल मॉडल साझा किए और आईआईएम अहमदाबाद के साथ चल रहे ‘गाय आधारित उन्नति’ प्रकल्प के विषय में बताया।
आईआईटी, बीएचयू के प्रो. पी. के. मिश्रा ने नवाचार और अंतःविषय सहयोग की केंद्रीय भूमिका की चर्चा की। अतिथियों का स्वागत अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. मृत्युंजय मिश्र, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दिवाकर साहू ने किया। इस दौरान कार्यक्रम संयोजक प्रो. जेबी कोमरैया ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर चर्चा की।