जाने माने साहित्यकार पं. धर्मशील चतुर्वेदी का शनिवार की दोपहर बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल में निधन हो गया। फेफड़े में संक्रमण के चलते पांच दिन पहले उन्हें बीएचयू के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। वह 83 वर्ष के थे।
निधन की जानकारी मिलने के बाद काशी के साहित्यकारों, पत्रकारों और संस्कृति कर्मियों में शोक की लहर दौड़ गई। उनका अंतिम संस्कार रविवार की सुबह नौ बजे मणिकर्णिका श्मशान घाट पर होगा।
दोपहर बाद करीब 2:30 बजे बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल में उनकी सांसें जब थमने लगीं, तब चिकित्सकों ने हर्ट पंपिंग भी की लेकिन उनका जीवन बचाने में कामयाबी नहीं मिल सकी। उनके दो पुत्र विक्रम शील चतुर्वेदी और विवेकशील चतुर्वेदी और एक पुत्री मनीषा हैं।
वह शहर की साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्था शनिवार गोष्ठी के अध्यक्ष थे। इस संस्था के बैनर तले काशी की जीवंतता से लोगों को परिचित कराने के लिए कई संदेशपरक और रोचक आयोजनों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
वह पहली अप्रैल को राजेंद्र प्रसाद घाट पर होने वाले महामूर्ख मेला, नागरी प्रचारिणी सभा में होने वाले उलूक महोत्सव जैसे आयोजनों के संयोजक थे। अस्पताल में अंतिम समय उनके पास मौजूद रहे हास्य कवि सांड़ बनारसी ने बताया कि वह काशी के अक्खड़पन और मस्ती के पर्याय थे।
निधन की जानकारी मिलने के बाद साहित्यकार डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र, गीतकार हरेराम द्विवेदी, अल कबीर, राजेंद्र गुप्त साहिल, डॉ. अत्रि भारद्वाज समेत तमाम लोग उनके घर पर अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।