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नागरी में चुनाव की अभी तक नहीं हुई पहल

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हिंदी को सर्वोच्च शिखर पर ले जाने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा में चुनाव की पहल अभी तक नहीं हो सकी है। कानूनी विवाद पर 10 जून को निर्णय आने के बाद भी सोसायटी ने चुनाव की रूपरेखा तैयार नहीं की है। वहीं, संस्था का पुराना वैभव लौटाने के लिए काशी के साहित्यकार और प्रबुद्धजनों ने पहल की है। सभी को अब सहायक निबंधक सोसाइटीज के अगले आदेश का इंतजार है।
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अंतरराष्ट्रीय महत्व की हिंदीसेवी संस्था नागरी प्रचारिणी सभा में पिछले 15 साल से चल रहे कानूनी विवाद पर निर्णय के बाद चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। उप जिलाधिकारी सदर ने सहायक निबंधक सोसाइटीज को नए चुनाव कराने के आदेश जारी किए गए हैं। 17 दिन बीतने के बाद भी अभी तक चुनाव को लेकर इस मामले में कोई निर्णय नहीं हो सका है। इसी बीच सोसायटी के रजिस्ट्रार का तबादला हो गया और नए रजिस्ट्रार ने अभी तक पदभार ग्रहण नहीं किया है।
ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि नए रजिस्ट्रार के आने के बाद ही इस दिशा में आगे कदम बढ़ाया जाएगा। एसडीएम ने 23 पृष्ठों के आदेश में संस्था पर काबिज कमेटी को गैरकानूनी माना है। इसके साथ ही सहायक निबंधक सोसाइटीज को 2004 की साधारण सभा के सदस्यों की सूची के आधार पर जिला प्रशासन की देखरेख में नए चुनाव कराने के आदेश दिए हैं।
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128 साल पुरानी संस्था है बदहाल
संस्कृतिकर्मी व्योमेश शुक्ला ने बताया कि हिंदी भाषा, नागरी लिपि के निर्माण और प्रसार में अनिवार्य भूमिका निभाने वाली 128 वर्ष पुरानी संस्था नागरी प्रचारिणी सभा की हालत चिंताजनक है। संस्था पर काबिज लोग निजी लाभ के लिए मनमाने ढंग से संस्था की मूल्यवान चल-अचल संपत्ति का दुरुपयोग कर रहे थे।
अरसे से बंद है प्रकाशन विभाग
नागरी प्रचारिणी सभा का मुद्रण और प्रकाशन विभाग अरसे से बंद है। प्राचीन किताबें आज अनुपलब्ध हैं और दूसरे प्रकाशक मौके का लाभ उठाकर, कॉपीराइट कानूनों का उल्लंघन करते हुए उन्हें चोरीछिपे छाप भी रहे हैं। सभा का मुख्य भवन जिसमें हिंदी का सबसे पुराना ‘आर्यभाषा पुस्तकालय’ है। यह सवा सौ साल पुरानी एक हेरिटेज इमारत है।
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