प्रभाती रागों पर नित नए कलाकारों की प्रस्तुति के साथ 656 दिन की निरंतरता का कीर्तमान बना चुकी सुबह-ए-बनारस की महफिल शुक्रवार को अस्सी घाट पर गुलजार हो गई। घाट पर बाढ़ के पानी और गाद भर जाने की वजह से महीने भर से सुबह-ए-बनारस का संगीत उडुपि मठ में चल रहा था। एक तरफ रागों, बंदिशों की खुशबू फैली तो दूसरी ओर गंगा आरती, यज्ञ के साथ योग भी आरंभ हो गया। घंटे-घड़ियाल गूंज उठे। हालांकि अभी दशाश्वमेध घाट पर आरती स्थल के पास मंदिरों की पहली मंजिल की छतों पर गाद भरी हुई है। इसलिए वहां स्थिति सामान्य होने में अभी समय लगेगा।
बाढ़ के चलते महीने भर तक पानी और गाद में डूबे रहे अस्सी घाट पर जन जीवन पटरी पर लौट आया। फेरी वाले झालमूड़ी लेकर घूमने लगे तो चाय वाले भी कुल्हड़ की सोंधी खुशबू के साथ घाट पर आ गए। देश-दुनिया में संगीत प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी सुबह-ए-बनारस की महफिल भी शुक्रवार की सुबह मुख्य मंच पर लगाई गई।
कोलकाता से आई पद्मविभूषण गिरिजा देवी की शिष्या सुचेता गांगुली ने राग भटियार में अलापचारी की। विलंबित एकताल की बंदिश के बोल थे-उचट गई मोरी नींद...। इसके बाद द्रुत तीन ताल में दूसरी बंदिश के बोल थे- पिया मिलन को...। अंत में भजन को बोल-तुम बिन शंकर कोई नहीं... से उन्होंने विदा ली। तबले पर सागर गुजराती और हारमोनियम पर जमुना वल्लभ दास गुजराती ने संगत की। संचालन किया प्रीतेश आचार्य ने। इससे पहले पाणिनी कन्या महाविद्यालय की छात्राओं ने अस्सी तट पर यज्ञ, हवन किया। हवन की सुगंध से वातावरण प्रफुल्लित हो उठा। गंगा आरती भी पूर्ववत स्थान पर हुई। सिल्ट हटते ही घाट पर पर्यटकों, श्रद्धालुओं की चहल-पहल बढ़ गई। शाम को विदेशी पर्यटकों ने जहां घाट का नजारा लिया, वहीं बीएचयू के छात्र-छात्राओं की भीड़ भी जगह-जगह अड़ियों पर नजर आई।