बीएचयू स्वतंत्रता भवन में आयोजित ‘रंगोत्सव’ के दूसरे दिन गुरुवार को ‘उजड़ा हुआ महाविद्यालय’ नाटक का मंचन हुआ। समूहन कला संस्थान की ओर से इस नाटक में आधुनिक समाज में संस्कार से दूर हो रही पीढ़ियों से सामाजिक मूल्यों के विघटन के दर्द को बयां किया गया। परिवार के टूटते-बिखरते, संस्कारहीन हो रही पीढ़ियों की समस्याओं को उजागर किया गया।
लेखक डॉ. ब्रजभूषण व निर्देशक राजकुमार शाह ने नाटक में दिखाया है कि वर्तमान में मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार किस तरह पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की नकल करने के प्रयास में अनैतिक कार्य करता है। अधिक से अधिक संपत्ति हासिल करने की होड़ में परंपराओं, आदर्शों को किस तरह अनदेखा कर रहा है। नाटक से उन्होंने ये बताने की कोशिश की कि किसी भी पीढ़ी के लिए उसका पहला महाविद्यालय उसका परिवार ही है। दादा दादी के साथ रहकर ही उनमें संस्कार के बीज पनपते हैं। नाटक में सभी कलाकारों ने अपनी भूमिका बेहतरीन ढंग से निभाई। दादा-दादी की भूमिका में अंकित पांडेय व रीता प्रकाश रहे। पापा मम्मी की भूमिका में केदारनाथ व गीता और बच्चों की भूमिका कुश कुमार, शुभो घोष, सोनाली सोनी व अंजली मौर्या ने निभाई। उजड़े हुए महाविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुनील विश्वकर्मा व प्रतीक शंकर बने। संगीत प्रवीण पांडेय, मेकअप सचिन, वस्त्र विन्यास वाजिद, रूपसज्जा सचिन का रहा।