साल 2000 में हुए शिया-सुन्नी दंगे में एक दर्जन लोगों की हत्या हो जाने के बाद बाहरी व्यापारियों ने नगर में आना बंद कर दिया। रेशमी साड़ियों की चमक पर ग्रहण लग गया। बुनकरों को मजबूर होकर अपने परिवार की जीविका के लिए खाड़ी देशों का सहारा लेना पड़ा।
बुनकर परिवार पहले काफी खुशहाल था। हर दिन पांच सौ रुपये कमा लेते थे। अथक प्रयास के बावजूद यहां की निर्मित साड़ियों को कोई ब्रांड नहीं मिला। बनारसी ब्रांड के नाम से ही इसकी पहचान विश्वभर में बनी रही। उद्योग को ब्रांड ना मिलने से भी कहीं ना कहीं इस कारोबार के धराशाई होने का मुख्य कारण माना गया।
पिछले दिनों कस्बे में भ्रमण के लिए पहुंचे डीएम के सामने बुनकरों ने इस उद्योग को ओडीओपी के तहत लाने की मांग उठाई थी। जिलाधिकारी की ओर से बुनकरों की मांग पर शासन को पत्र भेजा गया है। उन्होंने कहा कि इस उद्योग को ओडीओपी में शामिल कराने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे।