सभी धर्मग्रंथों के अनुसार पूरे भारतवर्ष में सौर दृक ब्राह्म गणनाओं से प्रदोषकाल व्यापिनी अमावस्या केवल 20 अक्तूबर को होने से दीपावली 20 अक्तूबर को ही श्रेयस्कर है। कुछ दृक पंचांगों ने 21 अक्तूबर को भी दीपावली लिखी है, जिससे दृक पक्षीय पंचांगकारों और आमजन में विसंगति व्याप्त है।
21 अक्तूबर को भारत के भूभाग अरुणाचल प्रदेश के डांग क्षेत्र में भी सूर्यास्त बाद पूर्ण प्रदोषकाल में अमावस्या व्याप्त नहीं है। दूसरे दिन अंतिम स्पर्श मात्र कर्मकाल में पारणादि सभी कार्य संभव नहीं है अत ग्राह्य नहीं है। अर्थात जिस दिन सूर्यास्त से पूर्व अमावस्या हो और तीन मुहूर्त बाद तक भी अमावस्या रहे उस दिन दीपावली होगी। ऐसी स्थिति 20 अक्तूबर को ही बन रही है।
पितरों की दीपावली की रात मशाल जलाकर करें मार्ग प्रशस्त
शास्त्रों की मान्यता है कि हमारे दिवंगत पितर कनागतों के पहले दिन प्रौष्ठपदी पूर्णिमा को पितृलोक से मृत्युलोक में आते हैं और दीपावली की रात उल्काओं की रोशनी देखते हुए पितरलोक को प्रस्थान करते हैं। इसलिए अपने-अपने पितरों को दीपावली की रात मशाल जलाकर ऊपर आसमान की ओर दिखाते हुए उनका मार्ग प्रशस्त करें अर्थात सम्मान से विदा करें।
यह कर्म छोटी दीपावली अर्थात चतुर्दशी की रात्रि में अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से बड़े से बड़ा पितृदोष शांत हो जाता है। प्रो. शुक्ल ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित महामहोपाध्याय बापूदेव दृकसिद्ध पंचांग के अनुसार 20 अक्तूबर को लक्ष्मी पूजा होगी।