कहा कि विगत 5-7 वर्षों से कुछ पंचांगकारों ने अपने पंचांगों में लुप्त संवत्सर का विनियोग करके वर्तमान में राक्षस नामक संवत्सर का उल्लेख किया है जबकि शुद्ध गणना पद्धति से अभी किसी संवत्सर का लोप प्राप्त नहीं हो रहा है।
अत: इस वर्ष आनंद नामक संवत्सर ही होगा तथा वर्ष पर्यंत संकल्पादि गणना में आनंद नामक संवत्सर का प्रयोग करना ही उचित होगा। इस पर विद्वानों ने सर्वसम्मतिपूर्वक अपनी सहमति देते हुए संवत्सर का नाम वर्ष पर्यंत आनंद ही व्यवहार में लाने की सहमति प्रदान की।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन जो संवत्सर होता है उसी की संकल्प आदि में वर्ष पर्यंत गणना की जाती है। परंतु यदा कदा ऐसी भी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जब स्वाभाविक रूप में किसी संवत्सर की प्रवृत्ति नहीं होती और उसे क्षय वर्ष अथवा लुप्त संवत्सर के नाम से जाना जाता है। संचालन महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने किया। इस दौरान प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो.चंद्रमौलि उपाध्याय, प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री, डॉ. सुभाष पांडेय मौजूद रहे।