बीएचयू विश्वनाथ मंदिर परिसर में दीपोत्सव
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स्वामी विवेकानंद ने दुनिया में भारत का मान बढ़ाया और अध्यात्म के जरिये शांति का मार्ग प्रशस्त किया। स्वामी विवेकानंद की इस आध्यात्मिक शक्ति के पीछे भी काशी की ही प्रेरणा थी। काशी का ही प्रकाश था जिसे स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण विश्व में अपने ज्ञान से प्रसारित किया। उनका काशी से गहरा नाता था और वह कई बार आए थे। वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि स्वामी रामकृष्ण मिशन के स्व. स्वामी वरिष्ठानंद ने बताया था कि स्वामी विवेकानंद कई बार काशी आए थे।
काशी यात्रा के दौरान विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आए तो देखा कि सामने कुछ बंदर धमाचौकड़ी मचा रहे थे। उन दिनों स्वामी जी लंबा अंगरखा पहनते थे और सर पर साफ ा बांधते थे। उनकी जेबों में किताबें और कागज रहते थे। भरी हुई जेबों को देखकर बंदरों को भ्रम हुआ कि उसमें खाने की वस्तु है और वह उनके पीछे पड़ गए।
अपने पीछे बंदरों को आते देख स्वामी जी भयभीत हो गए और तेज-तेज चलने लगे। बंदरों ने भी अपनी गति बढ़ा दी और स्वामी जी ने दौड़ना शुरू कर दिया। बंदर भी पीछे दौड़ने लगे। स्वामी जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें बंदर उनका पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे। भय के कारण वे पसीने से नहा गए, लेकिन कोई भी उनकी सहायता के लिए नहीं आया। सब तमाशबीन बन तमाशा देखते रहे।
तभी भीड़ में से ही स्वामी जी को एक कड़कदार आवाज सुनाई पड़ी। भागो मत... ज्यों ही ये शब्द स्वामी जी के कानों में पड़े। वे रुक गए। उन्हें बोध हुआ कि विपत्ति से डरकर जब हम भागते हैं तो वह और तेजी से हमारा पीछा करती है। अगर साहस से उनका मुकाबला किया जाए तो वह मुंह छिपाकर भाग जाती है। फ र क्या था वे मुड़े और निर्भीकता से खड़े हो गए। उन्हें देख बंदर भी खड़े हो गए। थोड़ी देर खड़े रहने के बाद वे सभी बंदर वापस लौट गए। वह दिन स्वामी जी के जीवन में एक नया मोड़ लेकर आया। उसके बाद समाज की बुराइयों को देख वे कतराए नहीं और हौसले के साथ उनका सामना किया।