गंगा तट पर बसी काशी की एक बड़ी आबादी पानी के जबरदस्त संकट से जूझ रही है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि न तो शहर के लोगों को रोजमर्रा की जरूरत भर पानी मिल पा रहा है और न ही गांव के लोगों को खेत सींचने भर। भूजल स्तर के लगातार नीचे जाने से हालात चिंताजनक हैं। वाराणसी के आठ में से सात विकास खंडों में भूजल संकट है। इसमें वह गांव नागेपुर भी शामिल है, जिसे पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया है।
नागेपुर गांव आराजीलाइन विकास खंड का हिस्सा है। यहीं पास के गांव मेहंदीगंज में एक शीतल पेय कंपनी का प्लांट है। गांव के लोगों का कहना है कि जब से यह कंपनी आई है, पानी का संकट उत्पन्न हो गया है। कंपनी अपने प्लांट के लिए भूजल का जबर्दस्त दोहन कर रही है। यही कारण है कि खेत की सिंचाई छोड़िए अब तो हलक तर करने भर पानी का भी गर्मियों में संकट हो जाता है। पूरा इलाका सालों पहले डार्क जोन घोषित हो चुका है। आराजी लाइन विकास खंड से सटा हरहुआ और पिंडरा विकास खंड भी पानी की किल्लत झेल रहा है।
भूगर्भ जल विभाग की मानें तो भू-जल स्तर में हर साल एक से दो मीटर की गिरावट आ रही है। ऐसा ठोस जल नीति नहीं होने के चलते है। प्रतिबंधित क्षेत्र आराजी लाइन, हरहुआ व पिंडरा ब्लाक में रोक के बाद भी गहरी बोरिंग जारी है। इस तरफ किसी भी प्रशासनिक अधिकारी का ध्यान नहीं। जिले के तीन ब्लाक आराजीलाइन, हरहुआ और पिंडरा पहले ही डार्क जोन घोषित हो चुके हैं, वहीं चोलापुर, चिरईगांव, बड़ागांव और काशी विद्यापीठ भी संकटपूर्ण स्थिति में पहुंच गए हैं। एकमात्र सेवापुरी ही ऐसा विकास खंड है जहां के किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध है।
135 लीटर पानी एक आदमी की रोजमर्रा की जरूरत है मगर यहां उसे मिलता है मात्र 80 लीटर पानी। बनारस शहर की बात करें तो यहां की आबादी के लिहाज से रोजाना 276 एमएलडी पानी की जरूरत है मगर 146 एमएलडी पानी की ही आपूर्ति हो पाती है। रोजाना 356 एमएलडी पानी गंगा और अन्य नलकूपों से लिया जाता है। शोधन के बाद उसकी आपूर्ति होती है लेकिन इसमें से 194 एमएलडी पानी रोजाना बरबाद हो जा रहा है। वजह, जर्जर भूमिगत पाइप लाइनें। सालों पहले बिछाई गई पाइप लाइन के जगह-जगह क्षतिग्रस्त होने के चलते पानी बरबाद हो रहा है।