वहीं ठेकेदार सिद्धार्थ राय का कहना है कि शवदाह गृह निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। मशीनरी प्लांट स्थल पर आ गई है। विभाग की ओर से 15 दिसंबर तक समय मिला है। उससे पहले विभाग को हैंडओवर कर दिया जाएगा। इलेक्ट्रॉनिक शवदाहगृह के मूर्त रूप लेने के बाद क्षेत्र में मृत पशु अब सार्वजनिक स्थानों पर फेंके हुए नजर नहीं आएंगे। इससे प्रदूषण पर भी प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकेगा।
प्रदेश में मृत पशुओं के पहली डिस्पोजल की व्यवस्था लेगी मूर्त रूप ले रही है। वाराणसी में पशुपालन का व्यवसाय भी तेजी से बढ़ा है। लेकिन पशुओं के मरने के बाद उनके डिस्पोजल की व्यवस्था अब तक नहीं थी। पशुपालक या तो इन्हें सड़क किनारे किसी खेत में फेंक देते थे या चुपके से गंगा में विसर्जित कर देते थे। इससे दुर्गंध के साथ साथ प्रदूषण भी फैलता था। अब पशुओं के डिस्पोजल के लिए इलेक्ट्रिक पशु शवदाह गृह का निर्माण जाल्हूपुर में करा रही है जो अंतिम चरण में है।
अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत अनिल कुमार सिंह ने बताया कि 0.1180 हेक्टेयर जमीन पर 2.24 करोड़ की लागत से इलेक्ट्रिक पशु शवदाह गृह बनाया जा रहा है। यह शवदाह गृह बिजली से चलेगा। भविष्य में आवश्यकता अनुसार इसे सोलर एनर्जी व गैस पर आधारित करने का भी प्रस्ताव है। इसकी क्षमता करीब 400 किलो प्रति घंटा के डिस्पोजल की है।
ऐसे में एक घंटे में एक पशु का और एक दिन में 10 से 12 पशुओं का डिस्पोजल यहां किया जा सकेगा। अनिल कुमार सिंह के अनुसार डिस्पोजल के बाद बची राख का इस्तेमाल खाद में हो सकेगा। पशुपालकों को और किसानों को डिस्पोजल और खाद का शुल्क देना होगा या यह निशुल्क होगा, इसका निर्णय जिला पंचायत बोर्ड की बैठक तय होगा। मृत पशुओं को उठाने के लिए जिला पंचायत पशु कैचर भी खरीदेगा।