पतंग बनाकर जीवन की गाड़ी चलाने वाली ये बहनें ही एक दूसरे की सहारा हैं। 50 वर्षीय नजीरून कहती है अम्मी और अब्बू के जाने के बाद हम दोनों ही एक दूसरे का सहारा बन गए। एक दूसरे का ख्याल रखने के लिए हमने कभी अपने निकाह के बारे में भी नहीं सोचा। वहीं 40 वर्षीय अफसाना कहती हैं मां-बाप के जाने के बाद आपा का हाथ थामें मैंने अपना जीवन बिता दिया।
पतंग बनाकर अपनी गाड़ी चलाने वाली ये बहनें सिलाई-कढ़ाई में भी माहिर हैं, अपनी इस कला को वो दूसरों को सीखाकर उनको आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखा रही हैं। सिलाई-कढ़ाई सीखाने के लिए उन्होंने कोई प्रशिक्षण केंद्र तो नहीं खोला, लेकिन आस-पड़ोस की महिलाओं और लड़कियों को उनके खाली समय में कला सीखाकर उन्हें माहिर जरूर बना रहीं है।