गैंगवार और अपराध की दुनिया में भी इन तवायफों की बड़ी भूमिका होती थी। कई बार गैंगवार के बाद अपराधियों को कोठों पर शरण मिलती थी। उस दौर में दालमंडी सिर्फ संगीत और मुजरे की जगह नहीं थी, बल्कि सत्ता, अपराध और पैसे के गठजोड़ का बड़ा केंद्र भी थी। फिर आया 1975 का दौर। उस समय इंस्पेक्टर रंजीत सिंह ने यहां के कोठों को खाली कराने का अभियान चलाया। तब तक करीब 20 बड़े कोठे ही बचे थे।
स्थानीय व्यापारी और आसपास रहने वाले लोग पहले से ही इस माहौल से असहज थे, इसलिए विरोध भी बहुत ज्यादा नहीं हुआ। धीरे-धीरे कोठों की दुनिया खत्म होने लगी। कोठों के बंद होने के साथ वह रईस तबका, जो रातों में यहां संगीत सुनने आता था, कहीं और चला गया। उसी दौरान एक तबका मंडुवाडीह की ओर शिफ्ट हो गया, जबकि कई रसूखदार लोगों ने गांवों और अपने इलाकों में निजी नाच-गाने का इंतजाम शुरू कर दिया।
दालमंडी सिर्फ तवायफों या व्यापार की वजह से ही मशहूर नहीं रही। यह फुटबॉल खिलाड़ियों का भी बड़ा गढ़ रही है। यहां से कई ऐसे खिलाड़ी निकले, जिन्होंने राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर पहचान बनाई। मरहूम नसीम इंडिया, शम्मू और अख्तर अली जैसे खिलाड़ी भारत के लिए खेले। वहीं नूर आलम, अन्नू खां, राणा, शमशाद, शाहिद बेलग्रामी, शिप्पे हसन शिप्पू और सलीम जैसे खिलाड़ी उत्तर प्रदेश की टीम का हिस्सा रहे। कहा जाता है कि मंडल स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ियों की संख्या सौ से भी ज्यादा थी। तंग गलियों और भीड़भाड़ के बीच फुटबॉल का यह जुनून दालमंडी की अलग पहचान बन गया था।
दालमंडी की पहचान उसके अजीबोगरीब किरदारों से भी रही है। यहां का भिंडी चाय वाला अपने गुस्से और गालियों के लिए मशहूर था। रात के दो बजे तक उसकी दुकान पर व्यापारी, पत्रकार और राजनीति से जुड़े लोग जमा रहते थे। लोग चाय कम और उसकी गालियां ज्यादा सुनने आते थे। इसी तरह अकबर पाया वाला और गुलाम रसूल पकौड़ी वाले की दुकानें भी मशहूर थीं।
ग्राहकों को डांटना, गालियां देना और फिर उसी अंदाज में खाना परोसना उनकी पहचान बन चुकी थी। 1980 का एक गैंगवार आज भी इलाके में कहानी की तरह सुनाया जाता है। बताया जाता है कि हमला करने आए बदमाश ने बम फेंका, लेकिन वह दीवार से टकराकर वापस उसी की ओर आ गिरा और फट गया। इसमें हमलावर की मौत हो गई। बाकी दो लोग भी इस संघर्ष में मारे गए। यह घटना लंबे समय तक दालमंडी की चर्चा का हिस्सा बनी रही।