गोशाला की हवा से खेत के पानी तक तकनीक
मेले में लगे स्टॉलों पर डेयरी और खेती से जुड़ी कई तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। ओजोन क्रॉप इनोवेट कंपनी की ओर से किसानों के लिए विभिन्न मशीनें प्रदर्शित की गईं। फ्यूमिजोन एयर ट्रीटमेंट मशीन के बारे में अभिजीत सोमलवार ने बताया कि यह गोशाला की दूषित हवा को बाहर निकालकर परिसर में हवा की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए तैयार की गई है।
डॉ. भाग्यश्री भटनागर ने नैनो बबल जनरेटर के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह मशीन पानी में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में मदद करती है। कृषि क्षेत्र में इसके संभावित उपयोग की जानकारी भी किसानों को दी गई।
बीएचयू के पशु चिकित्सालय एवं पशु विज्ञान संकाय से जुड़े डॉ. अमृत, डॉ. पप्पू कुमार, डॉ. अनुज और डॉ. प्रमोद कुमार ने पशुओं के पोषण, स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन से जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने साइलज समेत पशुओं के आहार प्रबंधन से जुड़े उपायों के बारे में बताया।
हर जिले में डेयरी सहकारी समिति बनाने की तैयारी
डेयरी विकास आयुक्त धनलक्ष्मी के. ने कहा कि सरकार का लक्ष्य हर जिले में डेयरी सहकारी समिति स्थापित करना और ब्लॉक स्तर पर राष्ट्रीय गोकुल मिशन को आगे बढ़ाना है। इससे पशुपालकों को संगठित बाजार और डेयरी व्यवस्था से जोड़ने पर जोर है।
मेले में किसानों के होनहार बच्चों और डेयरी विकास विभाग की विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को सम्मानित भी किया गया। संस्थानों, स्टार्टअप, सहकारी समितियों, सरकारी विभागों और ग्रामीण उद्यमों ने कृषि एवं डेयरी क्षेत्र से जुड़े समाधान प्रदर्शित किए।
बीएचयू के मिर्जापुर परिसर में भी डेयरी
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजीत चतुर्वेदी ने कहा कि विश्वविद्यालय भी गौपालन और दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में काम कर रहा है। मिर्जापुर परिसर में डेयरी की व्यवस्था है, जहां पशुपालन और दुग्ध उत्पादन से जुड़ी गतिविधियां संचालित की जाती हैं। उन्होंने कहा कि पशुपालन और डेयरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा है। ऐसे आयोजन पशुपालकों को नई जानकारी और तकनीक से जोड़ने में उपयोगी हो सकते हैं।
रंगीलो काशी में आराधिका जैसी अधिक दूध देने वाली पशुओं की नस्ल से लेकर गांव की तीन लीटर दूध बेचने वाली राजमुनी देवी तक, तस्वीर अलग-अलग जरूर है, लेकिन लक्ष्य एक ही दिखा- पशुपालन से आमदनी बढ़ाना। यही वजह है कि दो दिन के इस आयोजन में पशु प्रदर्शनी के साथ किसानों की निगाहें उन तकनीकों और जानकारियों पर भी टिकी हैं, जिन्हें वे लौटकर अपने गांवों में आजमाना चाहते हैं।