कौवे को माना गया देव पुत्र :
मान्यता के अनुसार पुराणों में कौवे को देवपुत्र माना गया है। इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौवे का रूप धारण किया था। त्रेतायुग में जब भगवान राम ने अवतार लिया और जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारा था। तब भगवान राम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी। जब उसने अपने किये की माफी मांगी। उस समय राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया भोजन पितरों को मिलेगा। तभी से श्राद्ध में कौवों को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौवों को ही पहले भोजन कराया जाता है।
प्रजनन क्षमता हुई है प्रभावित :
बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि इसके पीछे कई कारण हैं। इसमें एक तो पेड़ों की कटाई तो है ही, क्योंकि ये पेड़ों की खोह में ही अपना घोसला बनाते हैं। वहीं दूसरा फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए उपयोग किए जा रहे कीटनाशकों से वे खेतों में पानी पीने के चलते उनका प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है।
मुख्य वन मंडलाधिकारी केके पांडेय ने बताया कि कौवा पर्यावरण के लिए बहुत ही जरूरी पक्षी है। बदलते परिवेश से कौवे अब शहरों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों विशेष में समूह में सिमट गए हैं। इनकी संख्या कम होती जा रही है। वन विभाग ने कभी इनकी गणना तो नहीं कराई है, लेकिन इसके लिए शासन को पत्र लिखकर इनके संरक्षण को लेकर चर्चा की जाएगी।