बुनियादी सुविधाओं की बदहाली के पीछे धन और संसाधन की कमी का रोना रोने वाले नगर निगम के उच्चाधिकारी निगम की आय के स्रोत बढ़ाने के बजाय खुद राजस्व को झटका देने में जुटे हैं। शहर के अस्पतालों, नर्सिंगहोम और क्लिनिक संचालकों के प्रति नगर निगम की मेहरबानी से लाखों रुपये के राजस्व की क्षति पहुंची है। वित्तीय वर्ष 2014-15 में अस्पतालों से लाइसेंस शुल्क के तौर पर ली जाने वाली 41.50 लाख रुपये की धनराशि वसूली ही नहीं गई। इसका खुलासा प्रधान महालेखाकर की आडिट टीम की जांच में हुआ है। इस रिपोर्ट के आधार पर शासन ने निगम प्रशासन से तीन दिन में आख्या तलब की है।
शहर में संचालित होने वाले तीन सौ से अधिक अस्पतालों, नर्सिग होम और क्लिनिक संचालकों से निगम प्रशासन प्रति वर्ष लाइसेंस शुल्क वसूल करता है। वित्तीय वर्ष 2014-15 में प्रधान महालेखाकर की आडिट टीम ने नगर निगम कार्यालय की आडिट की थी। आडिट टीम ने जांच में पाया कि उस वित्तीय वर्ष में अस्पताल, नर्सिंग होम और क्लीनिक संचालकों से लाइसेंस शुल्क वसूला ही नहीं गया। इतना ही नहीं, उसके बाद के वित्तीय वर्ष में भी निगम प्रशासन की अस्पतालों पर इनायत बनी रही और लाइसेंस शुल्क वसूलने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। मौजूदा वित्तीय वर्ष में भी अब तक लाइसेंस शुल्क वसूला नहीं गया है।
ऑडिट में निगम अधिकारियों की अस्पतालों पर इस इनायत का खुलासा होने से अब खलबली मची है। शासन की ओर से आख्या तलब होने के बाद नगर निगम के मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी ने नगर स्वास्थ्य अधिकारी, मुख्य कर निर्धारण अधिकारी, प्रभारी अधिकारी राजस्व और आदमपुर, कोतवाली, दशाश्वमेध, भेलूपुर और वरुणापार जोनल अधिकारियों को पत्र जारी कर इस बारे में रिपोर्ट देेने को कहा है। उधर, नगर आयुक्त श्रीहरि प्रताप शाही का कहना है कि अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिक संचालकों से लाइसेंस शुल्क की वसूली का मामला कोर्ट में चला गया था, लिहाजा वसूली नहीं हो पाई थी। अब बकाया धनराशि समेत पूरी वसूली जल्द से जल्द सुनिश्चित कराई जाएगी।