वाराणसी। स्त्री लेखन के शुरूआती दौर को हम देखें तो उनके लेखन की चर्चा तो दूर उनके नाम भी गिनाए जाते थे। यह स्थिति सभी भारतीय भाषाओं में देखी जा सकती है। स्त्री लेखन की शुरूआत ही सेंसरशिप से होती है उनके लेखन पर अलग-अलग सेंसरशिप लगते थे। उक्त विचार जेएनयू की प्रो. गरिमा श्रीवास्तव ने व्यक्त किए। वह शुक्रवार को बीएचयू के कला संकाय के प्रेक्षागृह में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
स्त्री लेखन के आदि हस्ताक्षर विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो. सुशीला सिंह ने कहा कि अगर समय ने स्त्रियों के साथ कोई नाइंसाफी की है तो मानव जीवन के साथ नाइंसाफी है। विशिष्ट अतिथि प्रो. शंाति नायर ने कहा कि देखें तो स्त्री लेखन का इतिहास भी स्त्री स्वतंत्रता के इतिहास से जुड़ा हुआ है। संयोजिका प्रो. चंपा सिंह ने कहा कि वाचिक परंपरा में स्त्रियां बराबर की हिस्सेदार थीं लेकिन इतिहास के पन्नों पर उन्हें जगह नहीं मिली। स्वागत हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. रामकली सर्राफ, संचालन प्रो. चंपा कुमारी सिंह ने किया। इस अवसर पर हिंदी साहित्य की चुनिंदा कहानियां पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर प्रो. राजकुमार, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो.चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो.अजय कुमार, प्रो. आरती निर्मल, प्रो. शशिकला त्रिपाठी, प्रो. अनुराग दवे, डॉ. वंदना चौबे, प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी और डॉ. प्रभाकर सिंह ने विचार व्यक्त किए। कुलगीत मनोहर, अमित व साक्षी ने प्रस्तुत किया।