वाराणसी। बीएचयू के कला संकाय स्थित राधाकृष्णन सभागार में कथाकार अमरकांत के उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ के बहाने ‘इन्हीं हथियारों से : इतिहास का पुन: सृजन’ विषयक परिचर्चा में वक्ताओं ने चर्चा की। बतौर मुख्य वक्ता प्रो. बलिराज पांडेय ने कहा कि अमरकांत ने अपनी कृतियों में साहित्यिक संस्कृति को बखूबी रेखांकित किया।
राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली और कला संकाय के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. बलिराज ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए महात्मा गांधी के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को जन-ज्वार की संज्ञा दी। डॉ. प्रभाकर सिंह ने कहा कि ‘इन्हीं हथियारों से’ नामक उपन्यास में इतिहास अपने सहज यथार्थ रूप में आया है। कहा कि विमर्शों के दौर में आया यह उपन्यास स्वाधीनता के मूल्य को विकसित करता है। अध्यक्षता करते हुए कला संकाय प्रमुख प्रो. कुमार पंकज ने कहा कि अमरकांत की छवि हिंदी कथा साहित्य में एक कहानीकार की छवि है। डॉ. रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि ‘इन्हीं हथियारों से’ उपन्यास हमें बताता है कि साहित्य इतिहास से कैसे भिन्न होता है। अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि उपन्यास में इतिहास वैसे ही उपस्थित रहता है जैसे कविता में आख्यान मौजूद होता है। इस दौरान डॉ. नीरज खरे, जगन्नाथ दूबे, अंजनी मिश्र आदि मौजूद रहे।