लड़के कुछ बोल दें या मारपीट कर दें तो दिक्कत हो जाएगी। मगर उन्होंने कभी भी इसकी परवाह नहीं की। बेटी को खुलकर अपनी मर्जी से खेलने की हमेशा छूट दी। यही कारण है कि आज वह इस मुकाम पर पहुंची है कि दूसरे उसकी नजीर दे सकें। शुरुआती दिनों को याद करते हुए पिता बताते हैं कि खेल के दौरान राधा कई बार गिरी, चोटहिल हुई, मैदान में ही बेहोश हो गई, बावजूद खेल से मुंह नहीं मोड़ा। कई बार तो बुखार के दौरान भी वह मैच खेलने और प्रैक्टिस के लिए पहुंच जाती थी। पड़ोस में रहने वाले कोच प्रफुल्ल पाटिल ने राधा की प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारा।
बैट खरीदने को नहीं थे पैसे, लकड़ी से खेलती थीं
चार भाई-बहनों में सबसे छोटी राधा के पिता ओमप्रकाश यादव जनरल स्टोर की छोटी सी दुकान चलाते हैं। छोटी सी दुकान से मुंबई जैसे महानगर में जीविकोपार्जन बेहद मुश्किल रहा है। पढ़ाई-दवाई का खर्चा भी बमुश्किल निकल पाता है। ऊपर से बार-बार म्यूनिसिपल कार्पोरेशन की ओर से अतिक्रमण के नाम पर दुकानें हटाने की आशंका बनी रहती थी।
ऐसी विपरीत परिस्थितियों में राधा के पास किट तो दूर बैट खरीदने के पैसे नहीं थे। तब वह लकड़ी को बैट बनाकर अभ्यास करती थी। घर से तीन किमी दूर राजेंद्रनगर में मौजूद स्टेडियम तक पिता साइकिल से उसे छोडने जाते और फिर दूसरी ओर से राधा टेंपो तो कभी पैदल ही घर आती थी। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद न तो पिता ने हार माना और न ही बेटी ने हौसला छोड़ा।
शिखा के चयन से गांव में छाई खुशी
टी-20 वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम में शिखा पांडेय के चयन से पूरे गांव में खुशी का माहौल है। लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं। शिखा के पिता सुभाष पांडेय मचहटी गांव के निवासी हैं। सुभाष गोवा में जहां केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक हैं, वहीं दूसरे भाई जमुना पांडेय जबलपुर में अध्यापक हैं। शिखा का परिवार लंबे समय से गोवा में ही है। घर पर उनका आना-जाना काफी कम है। परिवार के नरेंद्र पांडेय ने बताया कि शिखा के चयन से जहां घर परिवार गांव का नाम रोशन हुआ है, वहीं वह प्रदेश व देश का नाम रोशन करेगी।शिखा पर पूरे परिवार को गर्व है।