संपूर्णानंद संस्कृत विवि में बैठक करते कुलपति व अन्य
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जनजातियों की समृद्ध ज्ञान परंपराओं, भाषाओं, लोककलाओं, पारंपरिक जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे विषयों पर संपूर्णानंद संस्कृत विवि में डिग्री और सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किए जाएंगे। वहीं इससे प्रोफेसर्स की शिक्षा, शोध, ट्रेनिंग, कोर्स निर्माण और मूल्यांकन प्रणाली पहले से बेहतर होगी। विद्या-वाचस्पति (डॉक्टोरल) कार्यक्रमों के संचालन, शोध की गुणवत्ता संवर्धन और बहुविषयक शैक्षिक संवाद को प्रोत्साहन मिलेगा। संपूर्णानंद संस्कृत विवि के योग साधना केंद्र में रविवार को विद्या परिषद् की बैठक में ये फैसला लिया गया।
बैठक में भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ संयुक्त समझौता कर कोर्स शुरू करने पर सहमति जताई गई। मंत्रालय की ओर से भेजे गए प्रस्ताव पर विद्या परिषद् ने अपनी सहमति और स्वीकृति दे दी है। जल्द ही विधिवत प्रक्रिया के अनुसार समझौता पूरा किया जाएगा। इस समझौते से विवि में ज्ञान संरक्षण के साथ-साथ कौशल, आत्मनिर्भरता और आजीविका के विकास पर कार्य किया जाएगा।
आईयूसीटीई (अंतर विवि अध्यापक शिक्षा केंद्र) की ओर से शैक्षणिक और शोध समझौते प्रस्ताव पर भी मुहर लगाई गई। अब विवि में अध्यापक शिक्षा, शोध, पाठ्यक्रम निर्माण और मूल्यांकन प्रणाली में स्वतंत्र और उच्चस्तरीय मानकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इन दोनों प्रस्तावों के आधार पर तय किया गया कि विवि एक ओर जनजातीय ज्ञान परंपराओं को संरक्षित कर उन्हें शैक्षिक मुख्यधारा से जोड़ रहा है। दूसरी ओर स्वायत्त अध्यापक शिक्षा केंद्र के माध्यम से अनुसंधान व शिक्षण की गुणवत्ता को उच्चतम स्तर तक विकसित किया जाएगा।
परंपरागत शिक्षा के साथ जुड़ेगी आधुनिकता
बैठक में कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि संपूर्णानंद संस्कृत विवि का लक्ष्य भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण करना है और आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ना है। जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ प्रस्तावित समझौता प्रस्ताव हमारी सांस्कृतिक विविधता को मजबूत करता है। यूजीसी की ओर से अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र से करार से अध्यापक शिक्षा एवं अनुसंधान में उत्कृष्टता, नवाचार और गुणवत्ता सुनिश्चित होगी। बैठक में कुलसचिव राकेश कुमार, परीक्षा नियंत्रक दिनेश कुमार, प्रो. जितेंद्र कुमार, प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो. विधु द्विवेदी, प्रो. शैलेश कुमार मिश्र आदि मौजूद रहे।