कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को पार्टी महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। इस फैसले से कांग्रेस कार्यकर्ता उत्साह से भर गए हैं। वाराणसी में बुधवार को कांग्रेसी नेताओं ने मिठाइयां बांट कर इसका जश्न मनाया।
इस बीच कांग्रेस के पूर्व विधायक अजय राय ने प्रियंका को इंदिरा गांधी का उत्तराधिकारी बताते हुए वाराणसी से चुनाव मैदान में उतारने की मांग भी कर दी। पूर्व सांसद डॉ. राजेश मिश्रा ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्णय से पार्टी और मजबूत होगी। पार्टी कार्यकर्ता उनके मार्गदर्शन से पूर्वांचल में ही नहीं, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सांसदों की संख्या बढ़ाएंगे।
उधर, कांग्रेस ने प्रियंका की राजनीति में एंट्री करवाकर 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले अपनाई गई भाजपा की रणनीति पर अमल किया है। प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश का जिम्मा सौंपकर कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ को उनके गढ़ों में घेरेगी।
माना जा रहा है कि नई रणनीति का बिहार पर भी प्रभाव पड़ेगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश से विधानसभा में 130 विधायक पहुंचते हैं तो यहीं से 26 लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं। सपा-बसपा गठबंधन के बाद प्रदेश के बदले सियासी समीकरणों में अपनी जगह तलाश रही कांग्रेस के लिए इसे मास्टर स्ट्रोक भले ही माना जा रहा है लेकिन प्रियंका के सामने स्थानीय क्षत्रपों को एक साथ लाना और बूथ स्तर पर पार्टी को मजबूत करने की बड़ी चुनौती होगी।
पूर्वांचल में कभी कांग्रेस के अलावा और कई पार्टी नहीं होती थी। धीरे-धीरे बसपा ने यहां पैठ बनाई और 2014 में भाजपा इतनी मजबूत हो गई कि मां-बेटे के अलावा कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली। परंपरागत वोटों को सहेजना प्रियंका की प्राथमिकता में होगा। जानकार मान रहे हैं कि ब्राह्मण और मुस्लिम वोटों पर उनका खास फोकस होगा। इसके लिए चुनाव में नए और युवा चेहरों को मौका दिया जा सकता है।
प्रो. सतीश राय कहते हैं कि 2014 में मोदी लहर के बावजूद वोटिंग प्रतिशत के हिसाब से कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था। 2009 में पूर्वांचल से कांग्रेस को छह सीट मिलीं थीं। उधर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अनिल श्रीवास्तव अन्नू का कहना है कि कांग्रेस फ्रंट फुट पर आ गई है। 2019 के चुनाव नतीजे कांग्रेस मुक्त भारत के मोदी के मिथकीय मंतव्य को खत्म कर देगी।