वाराणसी में राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव का समापन
राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव की अंतिम निशा शास्त्रीय और सूफी गायन से सजी। चोटी के कलाकारों ने इस शाम में सुरमयी रंग भरे। पं. जसराज के शास्त्रीय गायन ने महोत्सव को ऊंचाई दी। वहीं, खुले आसमां के नीचे विशाल मंच पर वडाली बंधुओं ने अपने सुरों से माहौल में सूफियाना रंग भरकर जाते-जाते इस महोत्सव को यादगार बना दिया। इस अंतिम प्रस्तुति का साक्षी बना बीएचयू का स्वतंत्रता भवन।
संस्कृति महोत्सव के अंतिम दिन शनिवार को इन खास शख्सियतों ने संगीत प्रेमियों का दिल जीता। शाम सात बजे स्वतंत्रता भवन में पद्मविभूषण पं. जसराज ने जब गाना शुरू किया तो लोग दम साधे सुनने लगे। उन्होंने राग पुरिया में ‘मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ध्वज:...’ से शुरुआत की। फिर हंस ध्वनि में ‘...गोविंद गुकुलानंदम गोपालम’ सुनाकर आनंद के सागर से भर दिया। अंत में तराना गाकर उन्होंने महोत्सव का समापन किया। हारमोनियम पर धर्मनाथ मिश्र, तबले पर राम कुमार मिश्र ने संगत की। गायन में रतन मोहन शर्मा और उनकी बेटी दुर्गा जसराज ने साथ दिया। उधर स्वतंत्रता भवन के बाहर बने मुक्ताकाशीय मंच पर पूरनचंद और प्यारेलाल वडाली बंधुओं ने अपने सूफी गायन से महोत्सव की अंतिम शाम को यादगार बनाया।
‘जब यार को देखा तो ऐसा लगा ईद हो गई...’ से लेकर ‘दमादम मस्त कलंदर...’ सुनाकर श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। बेहतरीन प्रस्तुति ‘तू माने या ना माने दिलदारा...’ रही, जिसे उन्होंने आखिर में लोगों की फरमाइश पर गाया। ‘कहीं मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा बना बैठे, हम से अच्छी जात परिंदों की है जो कभी मंदिर पर तो कभी मस्जिद पर जा बैठे...’ सुनाकर मिल्लत का पैगाम दिया।
इससे पहले उन्होंने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के मेल पर ‘नित खैर मंगदा सोणिया मैं तेरी..., ‘आज जाने की जिद ना करो...’ जैसे गीतों से महफिल सजा दी। इससे पहले पं. ओंकारनाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में संदीप महावीर ने कथक नृत्य की प्रस्तुति दी। वहीं विजय घाटे ने तबला, भवानी शंकर ने पखावज, राकेश चौरसिया ने बांसुरी और रवि चारी के सितार वादन के शास्त्रीय आर्केस्ट्रा ने भी महोत्सव को मनमोहक बना दिया। कला संकाय प्रेक्षागृह में छाया पुतली का आकर्षक प्रदर्शन सिंधे चिदंबरा राव ने किया।